चैरासी महादेव

उज्जयिनी में विराजित चैरासी महादेव

पार्वतीजी ने भगवान शंकर से निवेदन किया कि पृथ्वी पर जितने तीर्थ एवं नदियां हैं, उनका महात्य सुनाईये। तब शिवजी ने कहा पृथ्वी पर देवता, गंधर्व, मुनि आदि से सेवित पुण्य नहीं गंगा है। सूर्यपुत्री यमुना पितरों को प्यारी है। चंद्रभागा (चिनाब), वितस्ता (झेलम), अमरकंटक से निकलने वाली नर्मदा, कुरूक्षेत्र, गया, प्रभास, नैमिषरण्य, केदार, पुष्कर, कायावरोहण तथा महाकाल वन प्रसिद्ध तीर्थ हैं। महाकाल वन एक योजन क्षेत्र में फैला है तथा उसका प्रलय में भी नाश नहीं होता है। तब पार्वती द्वारा पूछने पर शिवजी ने कहना प्रारंभ किया-महाकाल वन में मुझे गंधवती, नवनदी, नीलगगा और क्षिप्रा प्रिय है। इनके संगम पर स्नान करने तथा श्राद्ध करने से गंगा स्नान से भी तीन गुना फल मिलता है। यहां चैरासी शिवलिंग, 8 भैरव, 11 रूद्र, 12 आदित्य, 6 विनायक, 24 मातृकाएं हैं। मैं जब महाकाल वन में गया तो वहां ब्रह्माजी और विष्णुजी भी पधार गए। वहां दस जगह विष्णु विराजमान हैं। उमा ने कहा-मुझे 84 शिवलिंग की महिमा सुनाइए-

1/84 अंगस्त्येश्वर महादेव

अगस्त्येश्वर महादेव मंदिर हरसिद्धि मंदिर के पीछे स्थित संतोषी माता मंदिर परिसर में हैं। पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख के अनुसार जब दैत्यों ने देवताओं पर विजय प्राप्त कर ली तब निराश होकर देवता पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे। वन में भटकते हुए एक दिन उन्होंने सूर्य के समान तेजस्वी अगस्त्येश्वर ऋषि को देखा। देवताओं के हाल को देखकर अगस्त्य ऋषि क्रोधित हुए। फलस्वरूप ज्वाला उत्पन्न हुई और स्वर्ग से दानव जलकर गिरने लगे। भयभीत होकर ऋषि आदि पाताल लोक चले गए। इससे अगस्त्य ऋषि दुःखी हुए। वे ब्रह्माजी के पास गए और कहने लगे कि मैंने ब्रह्म हत्या की है। अतः ऐसा उपाय बताओ जिससे मेरा उद्धार हो। ब्रह्मा ने कहा कि महाकाल वन के उार में वट यक्षिणी के पास उाम लिंग है। उनकी आराधना से तुम पाप से मुक्त हो जाओगे। ब्रह्माजी के कथन पर अगस्त्य ऋषि ने तपस्या की और भगवान महाकाल प्रसन्न हुए। भगवान ने उन्हें वर दिया कि जिस देवता का लिंग पूजन तुमने किया है, वे तुम्हारे नाम से तीनों लोकों में प्रसिद्ध होंगे। जो मनुष्य भावभक्ति से अगस्तेश्वर का दर्शन करेगा, वह पापों से मुक्त होकर सभी मनोकामनाओं को प्राप्त करेगा। तभी से श्रावण मास में विशेष रूप से अगस्तेश्वर महादेव की आराधना श्रद्धालुजन करते हैं।

2/84 गुहेश्वर महादेव

रामघाट पर पिशाच मुक्तेश्वर के पास सुरंग के भीतर स्थित है। इनके दर्शन मात्र से ही उाम सिद्धि प्राप्त होती है। ऐसा कहा जाता है कि ऋषि मंकणक वेद-वेदांग में पारंगत थे। सिद्धि की कामना में हमेशा तपस्या में लीन रहते थे। एक दिन पर्वत पुत्र विद्ध के हाथ से कुशाग्र नामक शाकरस उत्पन्न हुआ। ऋषि मंकणक को अभिमान हुआ कि यह उनकी सिद्धि का फल है। वे गर्व करके नृत्य करने लगे। इससे सारे जगत में त्रास फैल गया। पर्वत चलने लगे, वर्षा होने लगी, नदियाँ उल्टी बहने लगी तथा ग्रहों की गति उलट गई। देवता भयभीत हो महादेव के पास गए। महादेव ऋषि के पास पहुँचे और नृत्य करने से मना किया। ऋषि ने अभिमान के साथ शाकरस को घटना का जिक्र किया। इस पर महादेव ने अँगुष्ठ से ताडना कर अँगुली के अग्रभाग से भस्म निकाली और कहा कि देखों मुझे इस सिद्धि पर अभिमान नहीं है और मैं नाच भी नहीं रहा हूँ। इससे लज्जित होकर ऋषि ने क्षमा माँगी और तप का वरदान माँगा। महादेव ने आशीर्वाद देकर कहा कि महाकाल वन जाओ, वहाँ सप्तकुल में उत्पन्न लिंग मिलेगा। इसके दर्शन मात्र से तुम्हारा तप बढ़ जाएगा। ऋषि को लिंग गुहा के पास मिला। लिंग दर्शन के बाद ऋषि तेजस्वी हो गए और दुर्लभ सिद्धियों को प्राप्त कर लिया। बाद में लिंग गुहेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ऐसा कहा जाता है कि इनके दर्शन मात्र से इक्कीस पीढि़यों का उद्धार होता है।

3/84 ढूँढेश्वर महादेव

क्षिप्रा तट स्थित रामघाट के समीप धर्मशाला के ऊपर भाग पर स्थित है। रूद्र देवता ने इन्हें स्वर्ग दिलाने वाला, सर्वपाप हरण करने वाला बताया है। पुराणों के अनुसार कैलाश पर्वत पर ढूँढ़ नामक गणनायक था। वह कामी और दुराचारी था। एक दिन वह इंद्र के दरबार में जा पहुँचा और रंभा की फूलों से पिटाई कर दी। यह देखकर इंद्र ने शाप दिया, जिससे वह मृत्युलोक में मूर्छित् होकर गिर गया। होश में आने पर उसे अपने कृत्य पर क्षोभ हुआ और वह महेन्द्र पर्वत पर तप करने लगा। जब उसे सिद्धि प्राप्त नहीं हुई तो उसने धर्मकर्म त्याग दिया। तभी भविष्यवाणी हुई कि महाकाल वन जाओ, वहाँ कार्यसिद्धि होगी। वह वन में पहुँचा और सप्रतिकारक के शुभ लिंग के दर्शन किए। तप-आराधना से प्रसन्न होकर लिंग ने वरदान दिया। तब ढूँढ़ ने कहा कि मेरे नाम से आपको जाना जाए। तभी से ढूँढ़ेश्वर महादेव के नाम से वह लिंग प्रसिद्ध हुआ। इनके महात्य से व्यक्ति महादेव लोक को प्राप्त होता है।

4/84 डमरूकेश्वर महादेव

वैवस्वत कल्प में रू रू नाम का महाअसुर था। उसका पुत्र महाबाहु बलिष्ठ वज्र था। महाकाय तीक्ष्ण दंत वाले इस असुर ने देवताओं के अधिकार तथा संपत्ति छीन ली और स्वर्ग से निकाल दिया। पृथ्वी पर वेद पठन-यज्ञ आदि बंद हो गए और हाहाकार मच गया। तब सभी देवता ऋषि आदि एकत्रित हुए और असुर के वध का विचार किया। विचार करते ही तेज पुंज के साथ एक सुंदर स्त्री प्रकट हुई। उसने बारंबार अट्टाहास किया, जिससे संया में देवियाँ उत्पन्न हुई। उन सभी ने मिलकर वज्रासुर से युद्ध किया। दैत्य युद्ध स्थल से भागने लगे तो वज्रासुर ने माया प्रकट की। माया से कन्याएँ मोह को प्राप्त हो गई। तभी देवी कन्याओं को लेकर महाकाव वन में गई, लेकिन वज्रासुर भी उनके पीछे-पीछे वन में पहुँच गया। यह समाचार नारद मुनि ने शिवजी को दिया। शिवजी ने उाम भैरव का रूप धारण किया और वज्रासुर पर डमरू से प्रहार शुरू कर दिया। डमरू के शद से उाम लिंग उत्पन्न हुआ, जिससे निकली ज्वाला में वज्रासुर भस्म हो गया। उसकी सेना का भी नाश हो गया। तब देवताओं ने उाम लिंग का नाम डमरूकेश्वर रखा। इनके दर्शन से सभी दुःख दूर हो जाते हैं। श्री डमरूकेश्वर महादेव का मंदिर राम सीढ़ी के ऊपर स्थित है।

5/84 अनादिकल्पेश्वर महोदव

अनादि समय में कथा के पहले एक उाम लिंग पृथ्वी पर प्रकट हुआ। उस समय अग्नि, सूर्य, पृथ्वी, दिशा, आकाश, वायु, जल, चन्द्र, ग्रह, देवता, असुर, गंधर्व, पिशाच आदि नहीं थे। इस लिंग से जगत्स्थावर जंगम उत्पन्न हुए। इस लिंग को अनादि सृष्टा माना जाने लगा। ब्रह्मा तथा शिवजी में इस बात पर विवाद हो गया कि सृष्टि का निर्माता कौन है। दोनों स्वयं को मानने लगे। तभी आकाशवाणी हुई कि महाकाल वन में कल्पेश्वर लिंग है, यदि उसका आदि या अंत देख लोगे तो जान जाओगे कि वही सृष्टिकर्ता है। ब्रह्मा तथा शिव उसके आदि तथा अंत को नहीं खोज पाए। तब उन्होंने कहा कि पृथ्वी पर अनादिकल्पेश्वर नाम से यह लिंग प्रसिद्ध होगा। इसके दर्शन मात्र से ही सारे पाप नष्ट हो जाएंगे। यह लिंग महाकालेश्वर मंदिर परिसर में स्थित है।

6/84 स्वर्णजालेश्वर महादेव

जब महादेव को उमा के साथ कैलाश पर्वत पर क्रीड़ा करते सौ बरस बीत गए तो देवताओं ने अग्नि नारायण को उनके पास भेजा। महादेव ने अग्नि के मुँह में वीर्य डाल दिया। इससे अग्नि जलने लगा और वीर्य को गंगाजी में डाल दिया। फिर भी मुख में वीर्य के शेष रहने पर अग्नि जलने लगा। इस वीर्य शेष से अग्नि को पुत्र हुआ। इस तेजस्वी पुत्र का नाम सुवर्ण पुत्र था। इसे प्राप्त करने के लिए देवताओं तथा असुरों में युद्ध शुरू हो गया। दोनों और से अनेक मर गए। इस पर ब्रह्मघातक सुवर्ण को शिवजी ने बुलाया और श्राप दिया कि उसका शरीर बल के सहित विकारमय हो जाए तथा धातु रूप बन जाए। पुत्र मोह में अग्नि ने महादेव से कहा कि ये आपका ही पुत्र है, इसकी रक्षा आप ही करो। लोभवश महादेव ने उसे अभयदान दे दिया और वरदान माँगने को कहा। उसे यह भी कहा कि तुम महाकाल वन में जाकर कर्काेअकेश्वर के दक्षिण भाग में स्थित लिंग के दर्शन करो। दर्शन मात्र से तुम कृतकृत्य हो जाओगे। सुवर्ण के द्वारा उस लिंग के दर्शन-पूजन से प्रसन्न हो महादेव ने वरदान दिया कि तुम्हारी अक्षयकीर्ति होगी तथा तुम स्वर्णजालेश्वर के नाम से प्रसिद्धि पाओगे। जो भी तुम्हारी अर्चना करेगा वह पुत्र-पौत्र का सुख प्राप्त करेगा। ये महादेव राम सीढ़ी पर स्थित है।

7/84 त्रिविष्टपेश्वर महोदव

वाराह कल्प में पुण्यात्मा देव ऋषि नारद स्वर्गलोक गए। वहाँ इंद्रदेव ने नारदजी से महाकाल वन का माहात्य पूछा। नारदजी ने कहा कि महाकाल वन में महादेव, गणों के साथ निवास करते हैं। वहाँ साठ करोड़ हजार तथा साठ करोड़शत लिंग निवास करते हैं। साथ ही नवकरोड़ शक्तियाँ भी निवास करती हैं। यह सुनकर सभा में बैठे सभी देवता तथा इंद्र महाकाल वन पहुँचे। उनके पहुँचने पर आकाशवाणी हुई कि आप सभी देवता मिलकर एक लिंग की स्थापना कर्काेटक से पूरब में और महामाया के दक्षिण में करें। यह सुनकर देवताओं तथा इंद्र ने एक लिंग की स्थापना की। इंद्र ने लिंग को स्वयं का नाम त्रिविष्टपेश्वर दिया। महाकाल मंदिर में स्थित ओंकारेश्वर मंदिर के पीछे स्थित त्रिविष्टपेश्वर महादेव की पूजा-अर्चना अष्टमी, चतुर्दशी तथा संक्रांति को करने से विशेष फल प्राप्त होता है।

8/84 कल्पलेश्वर महादेव

वैवस्वत कल्प में, त्रैतायुग में, महाकाल वन में पितामह यज्ञ कर रहे थे। वहाँ ब्राह्मण समाज बैठा था। महादेव कापालिक वेश में वहाँ पहुँच गए। यह देखकर ब्राह्मणों ने क्रोधित हो उन्हें हवन स्थल से चले जाने को कहा। कापालिक वैश धारण किए महादेव ने ब्राह्मणों से अनुरोध किया कि मैंने ब्रह्म हत्या का पाप नाश करने के लिए बारह वर्ष का व्रत धारण किया है। अतः मुझे पापों का नाश करने हेतु अपने साथ बिठाएँ। ब्राह्मणों द्वारा इनकार करने पर उन्होंने कहा कि ठहरों, मैं भोजन करके आता हूँ। तब ब्राह्मणों ने उन्हें मारना शुरू कर दिया। इससे उनके हाथ में रखा कपाल गिरकर टूट गया। इतने पर कपाल पुनः प्रकट हो गया। ब्राह्मणों ने क्रोधित होर कपाल को ठोकर मार दी। जिस स्थान पर कपाल गिरा वहाँ करोड़ों कपाल प्रकट हो गए। ब्राह्मण समझ गए कि यह कार्य महादेव का ही है। उन्होंने शतरूद्री मंत्रों से हवन किया। तब प्रसन्न होकर महादेव ने कहा कि जिस जगह कपाल को फैंहा है, वहाँ अनादिलिंग महादेव का लिंग है। यह समयाभाव से ढँक गया है। इसके दर्शन से ब्रह्म हत्या का पाप नाश होगा। इस पर भी जब दोष दूर नहीं हुआ तब आकाशवाणी हुई कि महाकालवन जाओ। वहाँ महान लिंग दर्शन करते समय हाथ में स्थित ब्रह्म मस्तक पृथ्वी पर गिर गया। तब महादेव ने इसका नाम कपालेश्वर रखा। बिलोटीपुरा स्थित राजपूत धर्मशाला में स्थित कपालेश्वर महादेव के दर्शन करने मात्र से कठिन मनोरथ पूरे होेते हैं।

9/84 स्वर्गद्वारदेश्वर महादेव

नलिया बाखल स्थित स्वर्गद्वारेश्वर महादेव के पूजन-अर्चन से स्वर्ग की प्राप्ति होती है तथा मोक्ष मिलता है। पुराणों में अंकित जानकारी अनुसार अश्विनी तथा उमा की बहनें, कैलाश पर्वत पर उमा से मिलने आई तथा या में बुलाने पर पिता के यहाँ यज्ञ में गई। वहाँ उन्हें पता चला कि उनके पति को आमंत्रित नहीं किया गया है। तब उमा ने अपमानित हो प्राण त्याग दिए। जब उमा पृथ्वी पर अचेतन दिखीं तो सैकड़ों गण क्रोधित होकर वहाँ पहुँचे और युद्ध शुरू कर दिया। इस बीच वीरभद्र गण ने इंद्र को त्रिशुल मार दिया। ऐरावत हाथी को मुष्ठी से प्रहार कर ताडि़त किया। यह देख विष्णुजी को क्रोध आया और सुदर्शन चक्र फैंका। उसने गणों का नाश किया। गण घबराकर महादेव के पास गए। महादेव ने गणों को स्वर्ग के द्वार पर भेज दिया। देवताओं को स्वर्ग की प्राप्ति नहीं हुई तो वे ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा ने महादेव की आराधना करने को कहा। इंद्र देवताओं सहित महाकाल वन में कपालेश्वर के पूर्व में स्थित द्वारेश्वर गए। पूजन करन स्वर्गद्वारेश्वर के दर्शन मात्र से स्वर्ग के द्वार खुल गए तबसे स्वर्गद्वारेश्वर प्रसिद्ध हुए।

10/84 कर्काेटेश्वर महादेव

हरसिद्धि मंदिर परिसर स्थित कर्कोेटेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से विष बाधा दूर हो जाती है। ऐसा कहा जाता है कि माता उमा ने सर्पाें को श्राप दिया कि मेरा वचन पूरा नहीं करने से तुम जन्मेजय के यज्ञ में अग्नि में जल जाओगे। श्राप सुनकर सर्प भयभीत होकर भागने लगे। नागेन्द्र एलापत्रक नामक सर्प ब्रह्माजी के पास गया और सारा वृतांत सुनाया। ब्रह्मा ने उन्हें महाकाल वन जाने को कहा। उन्होंने कहा कि वहाँ जाकर महामाया के समीप महादेव की आराधना करो। यह सुनकर कर्काेटक नाम का सर्प स्वेच्छा से महामाया के सामने बैठकर महादेव की अर्चना करने लगा। महादेव ने प्रसन्न होकर वरदान दिया कि जो सर्प विष उगलने वाला क्रूर होगा उसका नाश होगा किंतु धर्माचरण करने वाले साँपों का नाश नहीं होगा। तभी से वह शिवलिंग कर्काेटेश्वर महादेव के नाम से वियात हो गया। इनके दर्शन से कभी भी सर्प पीड़ा नहीं होती है।

11/84 सिद्धेश्वर महादेव

सिद्धनाथ स्थित सिद्धेश्वर महादेव सिद्धि देने वाले हैं। इनकी सिद्धि करने पर अपुत्र को पुत्र, विद्यार्थी को विद्या प्राप्त होती है। कहा जाता है कि देवदारू वन में ब्राह्मण एकत्रित हुए और स्पर्धा के साथ तपश्चर्या करने लगे। तहर-तरह के व्रत व आसन करने के बाद भी सैकड़ों वर्षाें तक उन्हें सिद्धि प्राप्त नहीं हुई। तब वे तपश्चर्या की निंदा कर नास्तिकता का विचार करने लगे। तभी आकाशवाणी हुई कि ईष्र्या तथा स्पर्धा से किए तप से सिद्धि प्राप्त नहीं होती है। तुम सभी महाकाल वन जाओ और सिद्धि देने वाले महादेव की आराधना करो। यह सुनकर वे महाकाल वन गए और सर्वसिद्धि देने वाले शिवलिंग के दर्शन किए। उनका मनोरथ पूरा हुआ। उसी दिन से वह लिंग सिद्धेश्वर महादेव के नाम से यात हुआ।

12/84 लोकपलेश्वर महादेव

हरसिद्धि दरवाजा स्थित लोकपालेश्वर महादेव के दर्शन प्रत्येक अष्टमी को करने पर शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। साधक विमान में बैठकर इंद्रलोक जाते हैं तथा सुख को प्राप्त कर ब्रह्मलोक में गमन करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि हिरण्यकश्यप के समय हजारों दैत्यगण उत्पन्न हुए। उन्होंने संपूर्ण पृथ्वी पर स्थित आश्रमों को नष्ट कर दिया। यज्ञ-अग्निकुंडों केा मांस-मदिरा-रक्त से भर दिया। देवता भयभीत होकर विष्णु भगवान के पास गए। भगवान विष्णु उपाय सोचते तब तक दैत्यगणों ने इंद्र, वरूण, धर्मराज, अरूण, कुबेर आदि को जीत लिया। देवताओं की व्याकुलता देखकर भगवान विष्णु ने उन्हें महाकाल वन जाकर महादेव की आराधना करने को कहा। जब देवतागण महाकाल वन जा रहे थे तो रास्ते में दैत्यों ने उन्हें रोक लिया। वे पुनः भगवान विष्णु के पास गए तब उन्होंने कहा कि शिवभक्त बनकर शरीर पर भभूत लगाकर जाओ।

13/84 मनकामनेश्वर महादेव

गंधर्ववती घाट स्थित श्री मनकामनेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से सौभाग्य प्राप्त होता है। ऐसा कहा जाता है कि एक समय ब्रह्माजी प्रजा की कामना से ध्यान कर रहे थे। उसी समय एक सुंदर पुत्र उत्पन्न हुआ। ब्रह्माजी के पूछने पर उसने कहा कि कामना की आपकी इच्छा से, आपके ही अंश से उत्पन्न हुआ हूँ। मुझे आज्ञा दो, मैं क्या करूँ? ब्रह्माजी ने कहा कि तुम सृष्टि की रचना करो। यह सुनकर कंदर्प नामक वह पुत्र वहाँ से चला गया, लेकिन छिप गया। यह देखकर ब्रह्माजी क्रोधित हुए और नेत्राग्नि से नाश का श्राप दिया। कंदर्प के क्षमा माँगने पर उन्होंने कहा कि तुम्हें जीवित रहने हेतु 12 स्थान देता हूँ, जो कि स्त्री शरीर पर होंगे। इतना कहकर ब्रह्माजी ने कंदर्प को पुष्प का धनुष्य तथा पाँच नाव देकर बिदा किया। कंदर्प ने इन शस्त्रों का उपयोग कर वशीभूत करने का विचार किया तब महादेव ने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया। इससे कंदर्प (कामदेव) भस्म हो गया। उसकी स्त्री रति के विलाप करने पर आकाशवाणी हुई कि रूदन मत कर, तेरा पति बिना शरीर का (अनंग) रहेगा। यदि वह महाकाल वन जाकर महादेव की पूजा करेगा तो तेरा मनोरथ पूर्ण होगा। कामदेव (अनंग) ने महाकाल वन में शिवलिंग के दर्शन किए और आराधना की। इस पर प्रसन्न होकर महादेव ने वर दिया कि आज से मेरा नाम, तुम्हारे नाम से कंदर्पेश्वर महादेव नाम से प्रसिद्ध होगा। चैत्र शुक्ल की त्रयोदशी को जो व्यक्ति दर्शन करेगा, वह देवलोक को प्राप्त होगा।

14/84 कुटुबेश्वर महादेव

सिंहपुरी क्षेत्र स्थित कुटुबेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से गोत्र वृद्धि होती है। ऐसा कहा ाता है कि जब देवों तथा दैत्यों ने क्षीरसागर का मंथन किया तब उसमें ऐसा विष निकला, जिसने चारों ओर त्राहि मचा दी। देवताओं ने महादेव से स्तुति की कि वे इससे उनकी रक्षा करें। महादेव ने मोर बनकर उस विष को पी लिया, ंिकंतु वे भी इसे सहन नहीं कर पाए। तब महादेव ने क्षिप्रा नदी को वह विष दे दिया। क्षिप्रा ने इसे महाकाल वन स्थित कामेश्वर लिंग पर डाल दिया। वह लिंग विषयुक्त हो गया। इसके दर्शन मात्र से ब्राह्मण आदि मरने लगे। महादेव को मालूम होने पर उन्होंने ब्राह्मणों को जीवित किया तथा वरदान दिया कि आज से जो भी इस लिंग के दर्शन करेगा वह आरोग्य को प्राप्त होगा तथा कुटुब में वृद्धि करेगा। तब से यह लिंग कुटुबेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है।

15/84 इन्द्रद्युनेश्वर महादेव

पटनी बाजार क्षेत्र में, मोदी की गली स्थित इन्द्रद्युनेश्वर महादेव के दर्शन से यश तथा कीर्ति प्राप्त होती है। ऐसा कहा जाता है कि महिपति के राजा इन्द्रद्युनेश्वर थे। उन्होंने पृथ्वी की रक्षा पुत्रवत की। धार्मिक प्रवृत्ति के ये राजा स्वर्ग को प्राप्त हुए। पृण्य का हिस्सा पूर्ण होने पर वे पृथ्वी पर गिर पड़े। इससे उन्हें शोक-संताप हुआ। उन्होंने विचार किया कि बुरे काम करने पर ही स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरना पड़ता है, अतः पाप कर्म त्यागकर कीर्ति बढ़ाना चाहिए। वे स्वर्ग प्राप्ति की आकांशा में हिमालय पर्वत पर गए और मार्कण्डेय मुनि के दर्शन कर तपश्चर्या का फल पूछा। मुनि ने उन्हें महाकाल की आराधना करने को कहा। इन्द्रद्युन की तप आराधना से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान मिला कि लिंग उन्हीं के नाम से प्रसिद्ध होकर इंद्रद्युनेश्वर महादेव कहलाएगा।

16/84 ईशानेश्वर महादेव

पटनी बाजार क्षेत्र में मोदी की गली के बड़े दरवाजे में स्थित श्री ईशानेश्वर महादेव की आराधना से कीर्ति, लक्ष्मी तथा सिद्धि प्राप्त होती है। ऐसा कहा जाता है कि मंडासुर के पुत्र तुहुण्ड ने देवताओं पर बहुत जुल्म किए। उसने ऋषि, यक्ष, गंधर्व एवं किन्नरों को भी अपने अधिकार में कर लिया। इंद्र को जीतकर ऐरावत हाथी को अपनी मकान के दरवाजे पर बाँध लिया। देवताओं के अधिकारों का हरण कर उन्हें स्वर्ग जाने से रोक दिया। उनकी ऐसी स्थिति देखकर मुनि नारद ने कहा कि महाकाल वन जाओ। वहाँ इंद्रद्युनेश्वर महादेव के पास पूर्व दिशा में स्थित लिंग का पूजन-आराधना करो। ईशान कल्प में इसी लिंग की कृपा से राजा ईशान ने अपना खौया राज्य प्राप्त किया था। यह वचन सुनकर देवतागण, महाकाल वन गए। वहाँ उन्होंने लिंग की आराधना की। लिंग से अचानक धुआँ निकलने लगा, फिर ज्वाला निकली, उस ज्वाला ने तुहुण्ड को परिवार सहित जलाकर भस्म कर दिया। देवताओं ने लिंग का नाम ईशानेश्वर महादेव रखा।

17/84 अप्सरेश्वर महादेव

पटनी बाजार क्षेत्र में, मोदी की गली में ही कुएँ के पास स्थित अप्सरेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से ही अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति होती है। इनको स्पर्श करने से राज्य-सुख तथा मोक्ष मिलता है। एक बार नंदन वन में इंद्रदेव विराजित थे। अप्सरा रंभा नृत्य कर उनका मनोरंजन कर रही थी। अचानक कोई विचार आने पर रंभा की लय बिगड़ गई। इस पर इंद्र क्रोधित हुए और श्राप दिया कि वह कांतिहीन होकर मृत्युलोक में गमन करें। रंभा पृथ्वी पर गिर पड़ी और रूदन करने लगी। उसकी सखी अप्सराएँ भी वहाँ आ गई तभी वहाँ से मुनि नारद गुजरे। उन्होंने रंभा की जबानी सारा वृतांत सुना और बोले- रंभा तुम महाकाल वन जाओ। वहाँ मनोरथपूर्ण करने वाला लिंग मिलेगा। उसके पूजन, आराधना से तुम्हें स्वर्ग मिलेगा। उर्वशी अप्सरा को भी इनके पूजन से पुरूरवा राजा पति के रूप में मिले थे। ऐसा कहने पर रंभा ने लिंग की आराधना की। इस पर महादेव प्रसन्न हुए और रंभा को आशीर्वाद दिया कि वह इंद्र की वल्लभप्रिया बनेगी तथा यह लिंग अप्सरेश्वर महादेव के नाम से जाना जाएगा।

18/84 कलकलेश्वर महादेव

श्री कलकलेश्वर महादेव के दर्शन से कलह नहीं होता है। एक बार महादेव ने उमा को महाकाली नाम से पुकारा। इस बात को लेकर महादेव-उमा में कलह बढ़ गया। कलह के कारण तीनों लोक कपित होने लगे। यह देख देव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व आदि भय को प्राप्त हुए। इस भीषण हो-हल्ले में पृथ्वी के गर्भ से एक लिंग निकला। उस लिंग से शुभ एवं सुख वचन की वाणी निकली। लिंग ने त्रिलोक को शांति के वचन कहे। इस पर देवताओं ने उस लिंग का नाम कलकलेश्वर महादेव रखा। इसका पूजन-अर्चन करने वाले मनुष्य को दुःख व्याधि तथा अकाल मौत से मुक्ति मिलती है। ये महादेव मोदी की गली में कुएँ के सामने स्थित हैं।

19/84 नागचंद्रेश्वर महादेव

पटनी बाजार स्थित नागचंद्रेश्वर महादेव के दर्शन से निर्माल्य लंघन से उत्पन्न पाप का नाश होता है। ऐसा कहा जाता है कि देवर्षि नारद एक बार इंद्र की सभा में कथा सुना रहे थे। इंद्र ने मुनि से पूछा कि है देव, आप त्रिलोक के ज्ञाता हैं। मुझे पृथ्वी पर ऐसा स्थान बताओ, जो मुक्ति देने वाला हो। यह सुनकर मुनि ने कहा कि उमा प्रयागराज तीर्थ से दस गुना ज्यादा महिमा वाले महाकाल वन में जाओ। वहाँ महादेव के दर्शन मात्र से ही सुख, स्वर्ग की प्राप्ति होती है। वर्णन सुनकर सभी देवता विमान में बैठकर महाकाल वन आए। उन्होंने आकाश से देखा कि विमान उतारने की जगह दिखाई नहीं दे रही थी। इस पर निर्माल्य उल्लंघन दोष जानकर वे महाकाल वन नहीं उतरे, तभी देवताओं ने एक तेजस्वी नागचंद्रगण को विमान में बैठाकर स्वर्ग की ओर जाते देखा। पूछने पर उसने महाकाल वन में महादेव के उमा पूजन कार्य को बताया। देवताओं के कहने पर कि वन में घूमने पर तुमने निर्माल्य लंघन भी किया होगा, तब उसके दोष का उपाय बताओं। नागचंद्रगण ने ईशानेश्वर के पास ईशान कोण में स्थित लिंग का महात्य बताया। इस पर देवता महाकाल वन गए और निर्माल्य लंघन दोष का निवारण उन लिंग के दर्शन कर किया। यह बा चूँकि नागचंद्रगण ने बताई थी, इसीलिए देवताओं ने इस लिंग का नाम नाचंद्रेश्वर महादेव रखा।

20/84 प्रतिहारेश्वर महादेव

पटनी बाजार स्थित नागचंद्रेश्वर महादेव के पास प्रतिहारेश्वर महादेव का मंदिर है। इनके दर्शन मात्र से व्यक्ति धनवान बन जाता है। एक बार महादेव उमा से विवाह के बाद सैकड़ों वर्षाें तक रनिवास में रहे। देवताओं को चिंता हुई कि यदि महादेव को पुत्र हुआ तो वह तेजस्वी बालक त्रिलोक का विनाश कर देगा। ऐसे में गुरू महा तेजस्वी ने उपाय बताया कि आप सभी महादेव के पास जाकर गुहार करो। जब सभी मंदिराचल पर्वत पहुँचे तो द्वार पर नंदी मिले। इस पर इंद्र ने अग्नि से कहा हंस बनकर नदी की नजर चुराकर जाओ और महादेव से मिलो। हंस बने अग्नि ने महादेव के कान में कहा कि देवतागण द्वार पर खड़ें इंतजार कर रहे हैं। इस पर महादेव द्वार पर आए तथा देवताओं की बात सुनी। उन्होंने देवताओं को पुत्र न होने देने का वचन दिया। लापरवाही के स्वरूप उन्होंने नंदी को दंड दिया। नंदी पृथ्वी पर गिरकर विलाप करने लगा। नंदी का विलाप सुुनकर देवताओं ने नंदी से महाकाल वन जाकर शिवपूजा का महात्य बताया। नंदी ने वैसा ही किया। उसने लिंग पूजन कर वरदान प्राप्त किया। लिंग से ध्वनि आई कि तुमने महाभक्ति से पूजन किया है अतः तुम्हें वरदान है कि तुम्हारें नाम प्रतिहार (नंदीगण) से यह लिंग जाना जाएगा। तब से उसे प्रतिहारेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्धि मिली।

21/84 कुकुटेश्वर महादेव

प्राचीन समय में कोशिक नाम के राजा हुआ करते थे। वे अपनी प्रजा का ध्यान रखते थे और उनके राज्य में सभी सुख-सुविधाएँ थीं। राजा कौशिक दिनभर मनुष्य रूप में रहते थे और रात को कुक्कुट (मुर्गे) का रूप ले लेते थे। इस कारण उनकी रानी विषाला हमेशा दुःखी रहती थी। राजा के कुक्कुट रूप लेने के कारण वे रति सुख का आनंद नहीं ले पाती थीं। एक दिन रानी ने दुःख के कारण मरने का विचार किया और वह गालव ऋषि के पास पहुँची। विषाला ने अपना दुख गालव ऋषि को बताते हुए इसका कारण पूछा। गालव ऋषि ने बताया कि तुम्हारा पति पूर्व जन्म में राजा विदूरत का पुत्र था। वह विषयासक्त होकर मांसाहारी हो गया एवं अनेक कुक्कुटों का भक्षण किया। इस कारण क्ररूद्ध होकर कुक्कुटों के राजा ताम्रचूड़ ने उसे श्राप दिया कि वह क्षय रोग से पीडि़त होगा। श्राप के कारण वह क्षीण होने लगा। राजकुमार कौशिक वामदेव मुनि के पास गया और अपने रोग का कारण पूछा। वामदेव मुनि ने ताम्रचूड़ की बात बताई और उन्हीं से श्रापमुक्ति का उपाय पूछा। कौशिक ताम्रचूड़ के पास गया और निवेदन किया। ताम्रचूड़ ने कहा तुम निरोगी रहोगे और शासन करोगे परंतु रात को अदृश्य हो जाओगे। रानी ने गालव ऋषि से श्राप मुक्ति का उपाय पूछा तो उन्होंने बताया कि महाकाल वन में पक्षी योनि विमोचन लिंग जबलेश्वर के पास स्थित है, वहाँ जाओ और उनका पूजन करो। राजा रानी महाकाल वन में आये और शिवलिंग का पूजन किया। रात्रि होने पर राजा कौशिक अदृश्य नहीं हुआ और रानी के साथ रति सुख को प्राप्त किया। मान्यता है कि शिवलिंग दर्शन से कोई भी पितृ नरक प्राप्त नहीं होता।

22/84 कर्कटेश्वर महादेव

प्राचीन काल में धर्ममूर्ति नाम का एक राजा था जो इंद्र का मित्र था। उसने हजारों दैत्यों का नाश किया था। उसके तेज के कारण सूर्य और चन्द्र भी कांतिरहित नजर आते थे। उसकी दस हजार रानियों में से एक थी भानुमति, जो लक्ष्मी के समान आभा रखती थी। एक दिन राजा धर्म मूर्ति ने वशिष्ठ मुनि से अपने वैभव का कारण जानना चाहा। वशिष्ठ मुनि ने कहा राजन् आप पूर्व जन्म में शुद्धि जाति में जन्म लेकर पृथ्वी पति राजा थे। दुष्ट स्वभाव और वैदों की निंदा करते थे। तुमने शरीर छोड़ा तो तुम्हें कई नर्कोें में दुःख भोगना पड़ा। पृथ्वी पर तुम्हे कैकड़े के रूप में जन्म दिया। यहाँ तुम अवंतिका नगरी स्थित रूद्र सागर में अपना जीवन यापन कर रहे थे। एक दिन तुम अपनी इच्छा से तालाब से बाहर निकले तथा एक कौवा तुम्हें अपनी चोंच में लेकर उड़ गया। तुम्हारे बचने के प्रयास के कारण कौवे ने तुम्हें छोड़ दिया और तुम स्वर्ग द्वारेश्वर शिव मंदिर के पास स्थित शिवलिंग पर जा गिरे और मृत्यु को प्राप्त हुए। केकड़े का शरीर त्यागने के साथ ही तुमने दिव्य रूप में स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया। यहाँ अनेक सुख भोग कर तुम पृथ्वी पर यह शरीर प्राप्त किया। वशिष्ठ मुनि ने कहा कि केेकड़े के शरीर का त्याग करने के कारण यह शिवलिंग कर्कटेश्वर के नाम से विद्यात है। तुम वहाँ जाओ और उनका पूजन करो। राजा ने महाकाल वन में कर्कटेश्वर महादेव का पूजन कर शरीर त्याग दिया और फिर शिवलोक को प्राप्त किया। मान्यता है कि जो भी मनुष्य शिवलिंग का दर्शन कर पूजन करता है। वह पृथ्वी के सुखों को भोगकर परम गति को प्राप्त करता है।

23/84 मेघनादेश्वर महादेव

प्राचीन समय में मंदाध नाम का एक राजा था। राजा अंहकारी, दुष्ट और देव ब्राह्मण का शत्रु था। उस राजा के दोष के कारण बारह वर्षाें तक वृष्टि नहीं नहीं हुई। वृष्टि नहीं होने से नदियां सूख गई, कई नदियां अदृष्य हो गई। यज्ञ, स्वाध्याय, वेदाध्ययन व होम बंद हो गए। घरती से हाहाकार मच गया। जीव एक दूसरे को मारकर खाने लगे। ऐसे में सभी देवताओं को महाकाल वन में जाकर मेघों से वृष्टि करने वाले लिंग का पूजन करने के लिए कहा। सभी देवता प्रतिहारेश्वर महादेव से ईशान कोण पर स्थित इस लिंग पर पहुँचे और महादेव की स्तुति की। देवताओं की स्तुति से शिवलिंग से बड़े बादल प्रगट हुए और पृथ्वी पर वृष्टि होने से पुनः सृष्टि की स्थापना हुई। सभी देवताओं ने पुनः शिवलिंग का पूजन किया और शिवलिंग को मेघनादेश्वर नाम दिया। मान्यता है कि शिवलिंग के दर्शन मात्र से सभी कामनाएं पूर्ण होती है। शिवलिंग को स्नान व पूजन करने से मनुष्य रूद्रलोक में निवास करेगा।

24/84 महालयेश्वर महादेव

एक बार पार्वती जी ने शिव जी से पूछा कि सारे संसार में चर-अचर जो दिखाई देता हैं और जो सुनाई देता है सभी आप ने उत्पन्न किया है। इसके साथ ही संपूर्ण जगत आप में ही लीन होता है। इस पर शिव ने कहा देवी पार्वती महाकाल वन में प्रलय के समय मैंने यह धारण किया हुआ है। इसका नाम महालयेश्वर है। इस शिवलिंग से ब्रह्म, विष्णु, देवी-देवता, भूत, बुद्धि, प्रज्ञा, धृति, याति, स्मृति, लज्जा, सरस्वती सभी उत्पन्न हुए हैं, और प्रलय के समय सभी इसी में लीन होते हैं। मान्यता है कि जो भी इस शिवलिंग का पूजन करता है। वह त्रिलोक विजयी होती है।

25/84 मुक्तेश्वर महादेव

प्राचीन समय में अवंतिका नगरी में उमा मुक्ति नाम के ब्राह्मण रहते थे। वे शुद्ध चिा और जितेन्द्रिय थे। उन्होंने उमालिंग मुक्ति नाम के शिवलिंग के पास 13 वर्ष तक कठोर तप किया एक दिन वे क्षिप्रा में स्नान के लिए गए। इस दौरान उन्होंने एक मनुष्य को अपनी ओर आते देखा। उसके हाथ में धनुष- बाण थे। ब्राह्मण ने भयभीत होकर जप करना शुरू कर दिया तभी ब्राह्मण के हृदय में भगवान प्रकट हुए। इस पर वह मनुष्य भयभीत हो गया और उसके हाथ से धनुष-बाण छुट गया। कुछ देर बाद वह ब्राह्मण के साथ बैठकर तप करने लगा उसी क्षण वह दिव्य देह को प्राप्त हुआ मुक्तेश्वर शिवलिंग में समा गया। यह देख ब्राह्मण कहने लगा यह मनुष्य बिना किसी तप के मुक्ति को प्राप्त हो गया। वह कई वर्षाें से तप कर रहा है फिर भी उसे मुक्ति नहीं मिली। ऐसा विचार कर वह नदी के बीच में आ गया और वहां जप करने लगा। कुछ दिनों बाद वहाँा एक बाघ आया। वह नदी में उतर कर ब्राह्मण की ओर बढ़ा तब ब्राह्मण ने नमो नारायण का जप प्रारंभ किया। मंत्र सुनकर बाघ उस देह को त्याग दिव्य रूप में परिवर्तित हो गया। ब्राह्मण ने उससे पूछा आप कौन हो तो उसने कहा कि वह पूर्व जन्म में प्रतापी राजा दीर्घ बाहू हुआ करता था। एक दिन उसे अपने ज्ञान पर अहंकार हो गया। ब्राह्मणों ने उसे श्राप दिया था कि वह मांसाहारी रहकर जीवन जीएगा। मेरी विनती पर ब्राह्मणों ने कहा कि एक दिव्य ब्राह्मण नदी के बीच में नमो नारायण का जाप करेगा जिसे तुम सुनोगे और तुम्हें इस शरीर से मुक्ति मिल जाएगी। ब्राह्मण ने राजा से पूछा कि मुझे मुक्ति कैसे मिलेगी। इस पर राजा ने कहा कि ब्राह्मणों ने कहा कि उस ब्राह्मण को जब तुम अपनी मुक्ति को मुक्तेश्वर महादेव की महिमा का वर्णन करोगे तो मुक्त हो सकोगे। राजा और ब्राह्मण ने मुक्तेश्वर महादेव की अर्चना की ओर दोनों शिवलिंग में समा गए। मान्यता है कि इस शिवलिंग के दर्शन मात्र से सभी पाप नष्ट होते हैं।

26/84 सोमेश्वर महादेव

प्राचीन कथा के अनुसार दक्ष प्रजापति के श्राप के कारण चंद्रमा विलुप्त हो गये थे। चंद्रमा के विलुप्त होने से धरती पर औषधियाँ समाप्त होने लगी। इस पर देवताओं ने ब्रह्म की आज्ञा पर समुद्र मंथन किया गया और एक चंद्रमा धरती पर प्रजा का पालन करने लगा। श्राप ग्रस्त चंद्रमा ने भगवान विष्णु की आज्ञा से महाकाल वन में विराजित शिवलिंग की पूजा की और भगवान शिव से वरदान प्राप्त कर पुनः अपना शरीर और राज प्राप्त किया। चंद्रमा के पूजन करने के कारण शिवलिंग का नाम सोमेश्वर महादेव पड़ा। मान्यता है कि यहाँ पूजन करने से मनुष्य सभी कलंकों से मुक्त होता है, और अंत काल में मोक्ष को प्राप्त करता है।

27/84 अनर्केश्वर महादेव

प्राचीन समय में एक राजा थे निमि। अपने पुण्य कर्माें के कारण यमराज क्ै दूत उन्हें विमान में लेकर स्वर्ग जा रहे थे। यमदूत उन्हें दक्षिण मार्ग से नरक के सामने से लेकर जा रहा था। राजा निमि ने वहाँ करोड़ों लोगों को अपने पापों का फल भुगतते देखा, जिससे उन्हें पीड़ा हो रही थी। उन्होंने यमदूत से पूछा कि मुझे किस कर्म के कारण नरक देखना पड़ा है, दूत ने कहा कि आपने श्राद्ध के दिन दक्षिणा नहीं दी उसी कर्म के कारण आपको यह फल मिल रहा है। इसके बाद राजा ने पूछा मुझे किस कर्म कारण स्वर्ग मिल रहा है। इस पर यमदूत ने कहा कि आपने महाकाल वन में अश्विन में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को भगवान मनकेश्वर का दर्शन और पूजन किया था, जिसके फल स्वरूप आपको स्वर्ग की प्राप्ति हुई है। जैसे ही वे लोग आगे चलने लगे नरक के पापियों ने कहा कि है राजन आप थोड़ी देर और रूकें, आपके शरीर को स्पर्श कर आने वाली वायु उन्हें पीड़ा से मुक्ति दे रही है। राजा निमि ने दूर से कहा कि वे अव स्वर्ग नहीं जायेंगे और यही खड़े रहकर पापियों को सुख देंगे। इस पर इंद्र वहाँ उपस्थित हुए और राजा से स्वर्ग चलने को विनय किया। राजा ने मना किया और पूछा कि ये पापी अपने कर्म फल से कैसे मुक्त होंगे तो इंद्र ने कहा कि यदि आप अपने भगवान के दर्शन का पुण्य फल इन्हें दान कर दे तो सभी मुक्त हो जायेंगे। राजा निमि ने अपना पुण्य फल सभी पापियों को दान कर दिया, जिससे सभी पापी अपने पाप से मुक्त हो गए। मान्यता है कि अनरकेश्वर के दर्शन मात्र से नरक से मुक्ति मिलती है। अश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी केा पूजन करने से मनुष्य के सौ जन्मों के पाप नष्ट होते हैं और वह स्वर्ग के सुखों का भोग करता है।

28/84 जटेश्वर महादेव

प्राचीन समय में वीर धन्वा नाम के एक राजा हुआ करते थे। एक बार वे शिकार करने शिकार करने के लिए वन में गए, वहाँ उन्होंने मृग चर्म पहनकर वन में विचरण कर रहे संवत्र्तक ब्राह्मण के पाँच पुत्रों का वध कर दिया। राजावीर धन्या भय के कारण वन में देवरात मुनि के पास गया, वहाँ मुनि से अपने कर्म का वृतांत किया। मुनि देवरात ने कहा कि भगवान आपके पापों का नाश करेंगे। राजा उनकी बात को झूठ मानकर मुनि का भी वध कर क्रोधवश वहाँ से चला गया। आगे चलकर उसने गालव ऋषि के आश्रम में कपिला गाय का भी वध कर दिया। गहरे वन में राजा एक आसन पर जाकर सो गया। तभी वहाँ कुछ व्याघ्र आए और राजा को मारने के लिए दौड़े परंतु राजा के शरीर से एक देवी प्रकट हुई और व्याघ्रों का नाश कर दिया। राजा दुःखी होकर वाम मुनि के आश्रम में गया और अपने पापा कर्माें से मुक्ति का मार्ग पूछा वाम मुनि ने उसे महाकाल वन में शिवलिंग का पूजन करने के लिए कहा। राजा की जटाएँ बढ़ चुकी थी उसी हाल में राजा महाकाल वन आया और यहाँ अनर्केश्वर के उार में विराजित शिवलिंग का पूजन अर्चन किया। राजा के पूजन से वहाँ भगवान शिव प्रकट हुए, राजा को सभी पाप कर्माें से मुक्त किया। तभी से यह शिवलिंग जटेश्वर महादेव के नाम से विख्यात है। मान्यता है कि जटेश्वर के दर्शन मात्र से सभी पापों का नाश होता है।

29/84 रामेश्वर महादेव

प्राचीन समय में ऋषि जमदाग्नि की पत्नी रेणुका के गर्भ से एक बालक ने जन्म लिया। भृगु ऋषि के श्राप के कारण उनका जन्म पृथ्वी पर हुआ। उनके पिता जमदाग्नि ने कहा तुम माता तथा भाईयों का सिर काट डाते। पिता कि आज्ञा सुनते ही राम ने माता और भाईयों का मस्तक काट डाला। ऐसा करते ही ऋषि जमदग्नि प्रसन्न हो गए और राम को आर्शीवाद दिया कि तुम पृथ्वी पर होने वाले हर युद्ध में विजयी रहोगे। कुछ समय बाद कार्तवीर्य अर्जुन राजा के वंश में उत्पन्न हुआ सहस्त्रबाहु वहाॅ आया ओर जमदग्नि को मार डाला। पिता की मौत देखकर राम क्रोध में बोला कि में सहस्त्रबाहु के हजारों हाथों को काट दूंगा और युद्ध करने चला या ओर सहस्त्रबाहु के हजारों हाथों को काट डाला। इससे वे पाप के भागीदार बन गए। उन्होंने पापों की मुक्ति के लिए तप किया और पूदा कि ये पापी अपने कर्मफल से केसे मुक्त होंगे तो इन्द्र ने कहा कि यदि आप भगवान के दर्शन का पुण्य फल कर इन्हें दान दे पाप मुक्त हो जाएंगे। राम ने पुण्यफल सभी पापियों को दान कर दिया जिससे पापी मुक्त हो गए। मान्यता है कि रामेश्वर के दर्शन मात्र से ब्रह हत्या से मुक्ति मिलती है। अश्विन कृष्ण पख चतुर्दशी को पूजन करने से मनुष्य के सभी पापों का नाश होता है।

30/84 ज्यानेश्वर महादेव

महार्षि भृगु के पुत्र च्यवन नाम के ऋ़षि हुए। इन्होंने पृथ्वी पर बैठकर निराहार तपस्या की है। वितस्ता नाम की नदी के किनारे बैठकर इन्होंने तप करते हुए समाधि लगाई थी। इस कारण शरीर धूल-मिट्टी से ढंक गया ओर बेल भी उग आई। कुछ समय बाद इनके शरीर पर कीड़े लग गए। इसी दौरान राजा शर्याति धर्मात्मा जिनकी चार पत्नियां थी, वन विहार के लिए पुत्री सुकन्या के साथ आए। कन्या वस्त्र आभूषण ओर सखियों के साथ ऋषि के पास पहुंच गई। ऋषि की चमकती आंखों में सुकन्या ने कांटा चुभो दिया जिससे खून बहने लगा क्रोध में आकर ऋषि ने राजा को श्राप दे दिया। श्राप से पूरी सेना बीमार हो गई। राजा ने परेशान होकर मुक्ति के उपाय के लिए भगवान शिव का पूजन किया भगवान शिव प्रकट हुए राजा को सभी पाप से मुक्त किया, तभी यह शिवलिंग च्यवनेश्वर महादेव के नाम से वियात है। यह मान्यता है कि इनके दर्शन मात्र से सभी पापों का नाश होता है। मनुष्य अंतकाल में परमगति को प्राप्त होता है।

31/84 खंडेश्वर महादेव

प्राचीन समय में भद्राश्व नामक राजा हुआ करते थे। एक बार उनके राज्य में अगस्त्य मुनि पहुंचे ओर राजा से कहा कि वे सात दिन रूकेंगे। इस दौरान मुनि ने राजा को अत्यंत सुंदर रानी कांतिमति को देखा और सात दिनों तक प्रशंसा की। राजा ने आश्चर्य चकित होकर मुनि से इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि राजन आप पूर्व जन्म में हरिदा नामक वैश्य के दास थे ओर यह आपकी पत्नी थी। वैश्य ने एक बार महाकाल वन में जाकर भगवान शिव की पूजन किया ओर आप दोनो को रक्षपाल बना दिया। उसकी पूजन के प्रभाव से आप इस जन्म में राज्य को प्राप्त कर सके है। राजा ने मुनि से महाकाल वन में शिव पूजन का वृतांत सुना ओर पूजन किया। यहां स्वयं शिव ने राजा को दर्शन देकर उसके सभी खंड व्रत ओर दर्शन को पूर्ण करने का वरदान दिया ओर अंतकाल में स्वर्ग को प्रप्ति करने की बात की। खंड व्रत पूर्ण होने के कारण शिवलिंग खंडेश्वर के नाम से वियात हुआ। जो मनुष्य इस शिवलिंग के दर्शन ओर पूजन करता है उसके कई जन्मों के व्रत ओर दान जो खण्डित रह गए हो वो पूर्ण हो जाते है।

32/84 पत्नेश्वर महादेव

एक बार भगवान शंकर कैलाश पर्वत की गुफा में बैठे थे। तभी वहा पार्वती आई ओर पूछा कि आप कैलाश जैसे रमणीय ओर स्वर्ग जैसे स्ािान को छोडकर महाकाल वन में क्यों निवास कर रहे है। इसी दौरान वहां नारद मुनि पहुंचे। इस पर भगवान शिव ने उनसे पूछा कि हे नारद तुहे तीनों लोको में सबसे अधिक सुख ओर आनंद किस स्थान पर मिला। इस पर नारद मुनि ने कहा कि पृथ्वी लोक पर महाकाल वन में पान स्थान की विचित्रता श्रेष्ठ है। वहां हर मनुष्य भगवान शिव का स्मरण कर रहा है। जहां सुर्य, चन्द्र, देवी-देवता, इंद्र, अग्नि, यम सभी निवास करते है और आनंद को प्राप्त करते है। पान स्थान पर एक पीली आकृति है जो सभी सुख और आनंद प्रदान करने वाली है। पान स्थान पर होने के कारण शिवलिंग पानेश्वर महादेव के नाम से वियात है। मान्यता है कि जो मनुष्य इस शिवलिंग के दर्शन ओर पूजन करता है वह सभी सुखों का आनंद प्राप्त करता है।

33/84 आनंदेश्वर महादेव

कई वर्षो पूर्व पृथ्वी पर भौम अनमित्र नाम के राजा था। उनकी रानी थी वरवर्णिनी। राजा अत्यंत दयालु ओर प्रजापालक थे व सभी धर्मो को जानने वाले थे। रानी वरवर्णिनी ने पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम आनंद रखा। वह ज्ञानी व बुद्धिमान हुआ। जन्म लेते ही वहमाता की गोद में बैठ गया ओर हंसने लगा। रानी ने उसके हंसने का कारण पूछा तो उसने बताया कि पृथ्वी पर हर कोई अपने स्वार्थ सिद्धि में लगा है। रानी बालक की बात सुनकर सूतिका गृह चली गई। इस बीच जातहारणी राक्षसी ने बालक का अपहरण कर लिया ओर उसे विक्रांत राजा के पास छोड़ दिया ओर राजा विक्रांत के पुत्र चैत्ररथ को एक बोध ब्राहम्ण के यहाॅ रख दिया। यज्ञों पवित संस्कार के गुरू ने बालक आनंद को माता-पिता को नमस्कार करने को कहा तो उसने पूछा कि कौन सी माता को प्रणाम करूॅ, जिसने मुझे जन्म दिया या उस जिसने मेरा पालन पोषण किया। इस पर वहाॅ उपस्थित सभी लोग आश्चर्य में पड़ गए। इस पर आनंद ने पूरा वृतांत सभी को सुनाया ओर पश्चाताप करने का कहकर महाकाल वन गया। यहाॅ शिव ने आनंद को दर्शन देकर उसकी सभी मनोकामना पूर्ण की। इसके बाद आनंद को दर्शन देकर उसकी सभी मनोकामना पूर्ण की। इसके बाद आनंद मनु के रूप में वियात हुआ। मान्यता है कि आनंदेश्वर महादेव के दर्शन से पुत्र की प्राप्ति होती है और मनुष्य पृथ्वी लोक पर सभी सुखों को भोगकर स्वर्ग को प्राप्त करता है।

34/84 कंठारेश्वर महादेव

वतस्ता नदी के तट पर पांडव नामक एक ब्राहण निवास करता था। जातिवालों व उसकी पत्नी ने उसका त्याग कर दिया था। ब्राहम्ण के पास प्रेमधारिणी कथा रहती थी। पांडव ने एक गुफा में पुत्र कामना से शिव की तपस्या की। शिव ने प्रसन्न होकर उसे पुत्र प्रदान किया। ब्राहम्ण ने ऋषियों की उपस्थिति में पुत्र का यज्ञों पवित संस्कार कराया और ऋषियों को उसे दीर्घायु होने का आशीर्वाद देने के लिए कहा। ऋषि वहां से बिना आर्शीवाद दिए चले गए। इस पर ब्राहम्ण विलाप करने लगा ओर कहने लगा कि शिव ने उसे पुत्र प्रदान किया है वह अल्पायु केसे हो सकता है। पिता को विलाप करते देख बालक हर्षवर्धन ने संकल्प किया कि वह महेश्वर भगवान रूद्र का पूजन करेगा ओर उनसे चिरायु होेने का वरदान लेकर यमराज पर विजय प्राप्त करेगा। हर्षवर्धन ने महाकाल वन में भगवान रूद्र का पूजन कर उन्हें प्रसन्न किया ओर चिरायु होने ओर अंतकाल में शिवगुण होने का वरदान प्राप्त किया। हर्षवर्धन के नाम से कंथडेष्वर के नाम से शिवलिंग वियात हुआ। मान्यता है कि जो मनुष्य इस शिवलिंग का दर्शन कर पूजन करता है वह चिरायु होता है।

35/84 इंद्रेश्वर महादेव

काफी समय पहले त्वष्टा नाम के प्रजापति हुआ करते थे, उनका एक पुत्र था कृषध्वज। वह दान-धर्म करता था। एक बार इंद्र ने उसे मार दिया। इस पर प्रजापति ने क्रोध में अपनी जटा से एक बाल तोडा ओर उसे अग्नि में डाल दिया। अग्नि से वृत्रासुर नामक दैत्य उत्पन्न हुआ। प्रजापपति की आज्ञा से वृत्रासुर ने देवताओं से युद्ध किया ओर इंद्र को बंधक बना लिया ओर स्वर्ग में राज करने लगा। कुछ समय बाद देवगुरू बृहस्पति वहाॅ पहुॅचे और इंद्र को बंधनों से मुक्त कराया। इंद्र ने पुनः स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग बृहस्पति से पूछा। बृहस्पति ने कहा कि इंद्र तुम जल्द महाकाल वन में जाओं ओर खंडेश्वर महादेव के दक्षिण में विराजित शिवलिंग का पूजन करो। इंद्र ने शिवलिंग का पूजन किया। भगवान शिव ने प्रकट होकर इंद्र को वरदान दिया कि वह शिव के प्रभाव से वृत्रासुर से युद्ध करें ओर विजय प्राप्त करें। इंद्र ने वृत्रासुर का नाश किया ओर पुनः स्वर्ग पर अपना अधिकार प्राप्त किया। इंद्र के पूजन किए जाने के कारण शिवलिंग इंदे्रश्वर के नाम से वियात हुआ। जो भी मनुष्य शिवलिंग का पूजन करता है वह सभी पापों से मुक्त होता है। इंद्र के समान स्वर्ग को प्राप्त करता है।

36/84 मार्कडेश्वर महादेव

कई वर्षो पूर्व मृकण्ड नाम के एक ब्राहम्ण थे। वे वेद अध्ययन करते थे। उन्हें चिंता थी कि उनके यहाॅ पुत्र नहीं है। उन्होंने पुत्र की कामना से हिमालय पर जाकर कठोर तप प्रारंभ कर दिया। अनेक तप के कारण सृष्टि में अकाल पडते और सूर्य ओर चांद के अस्त होने की स्थिति निर्मित होने लगी। इस पर पार्वती ने शिव को कहा कि यह आपका भक्त है जो तप कर रहा हैं आप इसकी कामना पूर्ण करें। शिव ने कहा पार्वती आपके कहने पर मैं इसकी तपस्या पूर्ण करूॅगा। आप ब्राहम्ण से कहंे कि वह महाकाल वन में पानेश्वर के पूर्व में स्थित पुत्र देने वाले शिवलिंग का पूजन करें। आकाशवाणी के बाद ब्राहम्ण महाकाल वन में गया और शिवलिंग का पूजन किया। शिव पार्वती ने शिवलिंग से प्रकट होकर ब्राहम्ण को पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। शिव के वरदान से वहाॅ महामुनि मार्कडेश्वर प्रकट हुए। इस पर वे तुरंत ही शिव की आराधना करने बैठ गए। मार्कण्डेय को तप करते देख शिव ने कहा कि अब शिवलिंग तुम्हारे नाम से वियात होगा। मार्कण्डेय के प्रकट होने ओर पूजन से शिवलिंग मार्कण्डेश्वर के नाम वियात हुआ। जो भी मनुष्य शिवलिंग का पूर्ण श्रद्धा से पूजन करेगा वह सदा सुखी और परमगति को प्राप्त होगा।

37/84 शिवेश्वर महादेव

काफी समय पहले महाकाल वन में रिपुंजय नामक राजा राज्य करता था। वह प्रजा पालक था व हमेशा भगवान विष्णु के ध्यान में रहता था। उसके राज्य मंे प्रजा को कोई दुखी नहीं था। राजा का प्रताप इतना अधिक था कि उसके तेज से पृथ्वी कायम थी और कोई शिव का पूजन नहीं करता था। राजा रिपंुजय के काल में ही शिव ने महाकाल वन में शिवलिंग की स्थापना की थी, परंतु उज्जैन में शिवलिंग स्थापित नहीं कर पाए थे। यह सोचकर उन्होंने अपने गणेश शिव गण को आज्ञा दी कि वह उज्जैन में शिवलिंग की स्थापना करें। गण ब्राहम्ण का रूप धारण कर उज्जैन में आकर रहने लगा और प्रजा की विभिन्न व्याधियों को दूर करने लगा। जिनको पुत्र नहीं थे उन्हें औषधियों से पुत्र प्रदान करने लगा। उसकी याति फैलने लगी परंतु राजा उसके पास नहीं पहुॅचा। एक दिन राजा रिपुंजय की प्रिय रानी बहुत देवी के पुत्र नहीं होने पर उसकी एक सखी ब्राहम्ण के पास गई और उससे रानी को पुत्र प्रदान करने की प्रार्थना की। ब्राहम्ण ने कहा कि वह राजा की आज्ञा के बिना महल में नहीं आएगा। इस पर रानी ने अस्वस्थ होने का बहाना किया और राजा के साथ ब्राहम्ण के पास पहुॅच गई। राजा और रानी ने जैसे ही ब्राहम्ण के दर्शन किए ब्राहम्ण शिवलिंग में परिवर्तित हो गया। राजा-रानी ने वहाॅ शिवलिंग का पूजन किया। तब महादेव ने कहा कि राजन तुम्हारे यहाॅ पुत्र होगा जो धर्मात्मा, यशस्वी होकर सर्वभौम राजा होगा। गण के शिवलिंग होने के कारण शिवलिंग का नाम शिवेश्वर वियात हुआ। मान्यता है कि जो मनुष्य शिवलिंग का पूजन करेगा वह सभी पापों से मुक्त होकर अंतकाल में शिव के गणों में शामिल होगा।

38/84 कुसुमेश्वर महादेव

एक बार शिव पार्वती दोनों महाकाल वन में भ्रमण कर रहे थे। वहाॅ गणेश बालकों के समूह के साथ खेल रहा था। शिव ने पार्वती से कहा कि यह जो बालक फूलों से खेल रहा है और अन्य बालक उस पर पुष्प वर्षा कर रहे है, वह उन्हें बहुत प्रिय है। शिव ने वह बालक पार्वती को दे दिया। पार्वती ने पुत्र को देखने की इच्छा से अपनी सखी विजया से कहा कि वह जाए और बालक गणेश को लेकर आए। यहाॅ गणेश को उन्होंने विभिन्न आभूषणों ओर चंदन व पुष्पों से सज्जित किया और फिर शिव गणों के समूह में खेलने के लिए छोड दिया। बालक वहाॅ भी पुष्पों से खेलता रहा। पार्वती ने शिवजी से कहा कि यह मेरा पुत्र है इसे आप वरदान दें कि यह सभी गणों में सबसे पहले पुज्य होगा और कुसुमों में मंडित होने के कारण इसका नाम कुसुमेश्वर होगा। शिवजी ने कहा कि कुसुमेश्वर का जो भी मनुष्य दर्शन कर पूजन करेगा उसे कभी कोई पाप नहीं लगेगा। कुसुमेश्वर का जो भी पुष्पों से पूजन करेगा वह अंतकाल में शिवलोक को प्राप्त होगा। शिव के वरदान से कुसुमेश्वर शिवलिंग के रूप में महाकाल वन में स्थापित हुआ।

39/84 अक्रुरेश्वर महादेव

एक बार सभी देवी देवता, इंद्र, किन्नर, मुनि सभी पार्वती की स्तुति की कर रहे थे तब शिव के एक गण भृंगिरिट ने पार्वती की स्तुति करने से मना कर दिया। पार्वती के कई बार समझाने पर कि वह उनका पुत्र है और केवल शिव स्तुति से उसका कल्याण नहीं हो सकता है, परंतु वह पार्वती की बात नहीं माना और योग विद्या के बल पर उसने सम्पूर्ण मांस पार्वती को अर्पित कर दिया और शिवजी के पास पहुॅच गया। माता पार्वती ने उसे श्राप दिया कि क्रूर बुद्धि के कारण भृंगिरिट ने उसका अपमान किया है इस कारण वह मनुष्य लोक को प्राप्त होगा। श्राप के प्रभाव से भृंगिरिट तत्काल पृथ्वी लोक पर गिर पड़ा। वहाॅ उसने श्राप मुक्ति के लिए तपस्या प्रारंभ कर दी। तब शिव ने भृंगिरिट से कहा कि पार्वती ही तुम्हे श्राप मुक्त करेंगी तुम उनकी आराधना करोे। आपने उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उससे कहा कि महाकाल वन में शिवलिंग का पूजन करे, उसके दर्शन प्राप्ति से तुम्हारी बुद्धि सुबुद्धि में बदल जाएगी। भृंगिरिट ने महाकाल वन में जाकर शिव की उपासना की और शिवलिंग से पार्वती आधे शिव और आधे पार्वती के शरीर के साथ प्रकट हुई और उसे श्राप से मुक्त किया। भृंगिरिअ ने वरदान मांगा की जिस शिवलिंग के दर्शन से उसकी सुबुद्धि हो गई। वह शिवलिंग अक्रुरेश्वर के नाम से वियात होगा। मान्यता है कि जो भी मनुष्य शिवलिंग के दर्शन कर पूजन करेगा वह स्वर्ग को प्राप्त होगा। उसके सभी पाप नष्ट हो जाएगें।

40/84 कुंडेश्वर महादेव

एक बार माता पार्वती ने शिवजी से कहा कि उनका पुत्र वीरक कहाॅ है तो शिवजी ने कहा कि तुम्हारा पुत्र महाकाल वन में तपस्या कर रहा है। इस पर पार्वती ने शिव से कहा कि वे उसे देखना चाहती है, इसलिए वे भी उनके साथ चलें। दोनों नंदी पर सवार होकर महाकाल वन में लिए निकल पड़े। रास्ते मेें एक पर्वत पर पार्वती से कहा कि तुम कुछ देर यहाॅ रूकों में पर्वत देखकर आता हूॅ। कुण्ड नाक गण तुम्हारी सोवा में रहेगा और तुम्हारी आज्ञा मानेगा। शिवजी को पर्वत घूमते हुए 10 वर्ष बीत गए। शिव के न लौटने पर पार्वती विलाप करने लगी। उन्होंने कुण्ड गण को आज्ञा दी कि वह उन्हें शिव के दर्शन कराए। जब कुण्ड दर्शन नहीं करा सका तो पार्वती ने उसे मनुष्य लोक में जाने का श्राप दिया। इसी बीच शिव वहाॅ उपस्थित हो गए। पार्वती ने कुण्ड से कहा कि तुम महाकाल वन में जाओं और वहाॅ भैरव का रूप लेकर खडे रहो। वहाॅ पर उत्तर दिशा में सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला शिवलिंग है। उसका पूजन करों। शिवलिंग का नाम तुम्हारे नाम पर कुण्डेश्वर वियात होगा। कुण्ड ने पार्वती की आज्ञा से महाकाल वन में शिवलिंग का दर्शन कर पूजन किया और अक्षय पद को प्राप्त किया। मान्यता है कि शिवलिंग के दर्शन मात्र से सभी तीर्थो की यात्रा का फल प्राप्त होता है।

41/84 लुपेश्वर महादेव

लेच्छ गणों का राजा था लुपाधिप। उसकी रानी थी विशाला। एक बार राजा ब्राहम्णों के कहने पर युद्ध करने के लिए सामग नामक ब्राहम्ण के आश्रम गया। वहाॅ राजा ने आश्रम में कामधेनु गाय की माॅग की ब्राहम्ण ने मना किया तो राजा ने कामधेनु गाय के साथ पूरे आश्रम का नाश कर दिया। राजा ने अपने बाणों से सागम मुनि का भी वध करदिया और वहाॅ से चला गया। कुछ देर बाद ही वहाॅ सागम मुनि का पुत्र समिधा आश्रम पहुॅचा और अपने पिता को मृत देखकर वह रूदन करने लगा और फिर उसने अपने पिता की हत्या करने वाले राजा को श्राप दिया कि वह कुष्ठ रोग से पीडित होगा। श्राप के प्रभाव से राजा कुष्ठ रोड से पीडित होकर मृत्यु को प्राप्त करने के लिए निकल गया। राजा के चिता पर होने पर वहाॅ नारद मुनि प्रकट हुए और उसे समिधा के श्राप से अवगत कराया। नारद मुनि के कहने पर राजा महाकाल वन में केशवार्क महादेव के पास स्थित शिवलिंग का पूजन करने के लिए निकल गया। राजा ने अपनी रानी के साथ शिप्रा स्नान किया और शिवलिंग के दर्शन किए। दर्शन मात्र से राजा का कुष्ठ रोग दूर हो गया। राजा ने अपनी रानी के साथ वहाॅ उपस्थित मुनियों का सम्मान किया। राजा लुपाधिप के पूजन के कारण शिवलिंग लुपेश्वर महादेव के नाम से वियात हुआ। मान्यता है कि जो भी मनुष्य पूर्ण भक्ति से पूजन करेगा उसके सात जन्मों के पाप नष्ट होंगे और अंतकाल में परम पद को प्राप्त करेगा।

42/84 गंगेश्वर महादेव

आकाश मार्ग से गंगा जब पृथ्वी पर प्रकट हुई तो भगवान शंकर ने उसे अपनी जटा में धारण किया। शिवजी ने जटा में धारण करने के बाद उसे धरती पर नहीं आने दिया, इससे गंगा क्रोधित हो गई और शिवजी के शरीर को शीतल कर दिया। शिवजी ने भी क्रोध में गंगा को जटा में बांध लिया। कई कल्प वर्षो तक गंगा ने जटा में ही तपस्या की। भागीरथ की उपासना से गंगा का धरती पर अवतरण हुआ और समुद्र की पत्नी हुई। एक बार सभी देवी देवता ब्रम्ह लोक में ब्रम्हा की स्तुति करने के लिए वहाॅ पहुॅचे। वहाॅ गंगा और समुद्र भी गये। वायु के वेग से गंगा का आंचल उड़ गया, इसे देख सभी देवताओं ने अपने मुख नीचे कर लिये, परंतु महाभिष नामक राजऋषि गंगा को देखते रहे। यह देखते हुए ब्रम्हा जी ने उसे पृथ्वी लोक पर भेज दिया। यह देखकर समुद्र ने भी गंगा को मृत्यु लोक में रहने का श्राप दिया। श्राप के कारण विलाप करती गंगा ने ब्रम्हा से विनय किया। ब्रम्हा ने कहा कि गंगा तुम महाकाल वन में शिप्रा के दक्षिण में स्थित शिवलिंग का दर्शन और पूजन करो। गंगा महाकाल वन आई और गंगेश्वर महादेव के अपनी सखी शिप्रा के साथ दर्शन कर पूजन किया। गंगेश्वर के दर्शन से गंगा श्राप मुक्त हुई उसी समय समुद्र भी वहाॅ उपस्थित हुए और गंगा का समान किया। मान्यता है कि गंगेश्वर के दर्शन से सभी तीर्थो की यात्रा का फल प्राप्त होता है और मनुष्य अंतकाल में परमगति को प्राप्त करता है।

43/84 अंगारेश्वर महादेव

पहले कल्प में लाल शरीर की शोभावाला टेढ़ा शरीर वाला क्रोध से युक्त एक बालक शिव जी के शरीर से उत्पन्न हुआ। इसे शिवजी ने धरती पर रख दिया। उसका नाम भूमिपुत्र हुआ। जन्म से ही उसका शरीर भयावह रहा। जब वह धरती पर चलने लगा तो धरती कांपनी लगी, समुद्रों में तूफान आने लगा। यह सब देखकर देवतओं ओर मनुष्यों में चिंता होने लगी और वे देवगुरू बृहस्पति के पास गए। उन्होंने कहा कि बालक भगवान शंकर के शरीर से उत्पन्न हुआ है और उत्पन्न होते ही उत्पात मचा दिया है। यह सब सुनकर देवगुरू देवताओं को लेकर कैलाश पर्वत गए और भगवान को त्रासदी के बारे में बताया। यह सुन भगवान ने बालक को अपने पास बुलाया। बालक ने आकर शिवजी से पूछा हे प्रभु मेरे लिए क्या आज्ञा है। मैं क्या करूॅ। तब भगवान ने कहा बालक तुम्हारा नाम अंगारक रखा है। तुम्हे पृथ्वी पर लोगो के कल्याण के लिए कार्य करना चाहिए बजाए विनाश के। यह वचन सुनकर बालक उदास हो गया। तब भगवान ने अपनी गोद में बैठाकर समझाया। हे पुत्र मैं तुम्हे उज्जैन नगरी में काम स्थान देता हूॅ। महाकाल वन में खगर्ता व शिप्रा का संगम है। शिव ने कहा मैंने जब गंगा को मस्तक पर धारण किया था। उस समय वह गुस्से से चंद्र मंडल से नीचे गिरी थी। आकाश से नीचे आने पर उसका नाम खगर्ता हुआ। इसलिए मैंने वहाॅ अवतार लिया है। मैं तुम्हे तीसरा स्थान देता हूॅ। तुम वहाॅ जाकर रहो इससे तीनों लोकों में तुम्हे जाना जाएगा और तुम्हारी तृप्ति भी होगी। लोग तुम्हारी प्रसन्नता के लिए चतुर्थी का व्रत करेंगे, पूजन करेंगे और दक्षिणा देंगे। इससे तुम्हे भोजन की तृप्ति होगी। तब बालक यहाॅ पर आया। इसके बाद से ही इनके दर्शन से भक्तों को सर्वसम्पदा प्राप्त होती है।

44/84 अरेश्वर महादेव

पहले इंद्र राजा ने मेघों को वृष्टि करने के लिए नियमानुसार आदेश से नियमानुसार वर्षा होती थी। कुछ समय तक मेघों ने अपनी इच्छानुसार वर्षा करना शुरू कर दिया जिससे पृथ्वी जलमग्न होने लगी। यज्ञ और हवन तक बंद हो गए, जिसको देखकर ऋषि मुनि भयभीत होने लगे। इसकी शिकायत ऋषि मुनियों एवं देवगुरू ने ब्रम्हा से की। ऋषियों की परेशानी को सुनकर देवगुरू ने इंद्र को बुलाया। इंद्र ने देवगुरू से आज्ञा माॅगते हुए पूछा महाप्रभु मेरे लिए क्या आदेश है। देवगुरू ने पृथ्वी के जलमग्न होने की घटना देवेन्द्र को बताई। इस पर देवेन्द्र ने मेघों के राजा को बुलाया समझाया। कुछ दिनांे तक मेघ नियमानुसार बरसने लगे ओर बीच में अचानक से प्रलयनुमा वर्षा करने लगे। जिससे पृथ्वी पर हाहाकार मच गया। यह देखकर देवेन्द्र भगवान शिव की शरण में गए। मेघों के इस व्यवहार की बात बताई। भगवान शिव ने उपर के मेघों को बुलाया जिसके पास एक करोड़ मेघ थे। मेघ ने शिव से आज्ञा माॅगी। भगवान ने कहा तुम महाकाल वन में भगवान गंगेश्वर की आराधना करो जिससे तुम्हारा क्रोध कम होगा और तुम्हे अधिक वर्षा करने की आवश्यकता भी नहीं होगी। शिव आराधना करने से प्रसन्न होकर प्रकट हुए तथा मेघ को वरदान दिया कि पृथ्वी पर अरेश्वर नाम से प्रसिद्धि होगी और महाकाल वन में स्थित लिंग अरेश्वर के नाम से वियात होगा।

45/84 त्रिलोचनेश्वर महादेव

राजनामा मंदिर पीठ पर स्थित त्रिलोचनेश्वर महादेव में सालों पूर्व कबूतर का जोड़ा रहता था। दोनों भगवान का दर्शन करते और अर्पित जल पीते भक्तों द्वारा की जाने वाली भगवान जयकार, भजन कीर्तन को सुनते रहते थे। एक दिन एक श्येन वहाॅ आया और सोचने लगा कि कैसे वह इनका भक्षण करें। कबूतरी ने श्येन को देख लिया और वह चिंता करते हुए कबूतर सेकहने लगी कि वह श्येन हमें भक्षण करने आया है। श्येन एक दिन कबूतरा को अपने साथ आकाश मार्ग ले गया। कबूतरी ने श्येन के पंजों में काटा जिससे कबूतर नीचे गिर गया और जंबूद्वीप में गिरकर मर गया। अगले जन्म में वह कबूतर मंदारा नाम के गंधर्व के यहाॅ परिमल के नाम से जन्मा। दूसरी ओर कबूतरी ने नागराज के यहाॅ रत्नावली के रूप में जन्म लिया। परिमल किशोरावस्था से ही त्रिलोचनेश्वर महादेव के दर्शन और पूजन के लिए अवंतिका आने लगा। इधर रत्नावली ने भी भगवान महादेव के दर्शन व पूजन की कामना से यहाॅ आना शुरू कर दिया। एक दिन रत्नावली सखियों के साथ मंदिर में ही सो गई। तब भगवान शिव ने दर्शन देकर पूर्व जन्म की कथा सुनाई और अवगत कराया कि परिमल पूर्व जन्म में तुम तीनों का पति था। तीनों कन्याओं ने बात माता-पिता को बताई। एक बार परिमल और नागराज पूरे परिवार के साथ त्रिलोचनेश्वर महादेव का पूजन करने के लिए आए। यहाॅ दोनों परिवारों में शिप्रा द्वारा कन्याओं को दिए वरदान पर चर्चा कर विवाह परिमल के साथ कर दिया। इसके बाद परिमल वहीं रहकर पूजन करने लगा। मान्यता है कि जो भी मनुष्य त्रिलोचनेश्वर महादेव के दर्शन कर पूजन करेगा वह समस्त सुखों का भोग कर अंत काल में परमपद को प्राप्त करेगा।

46/84 वीरेश्वर महादेव

प्राचीन समय में अमित्रजित नाम का एक राजा था। वह प्रजा पालक था। उसके राज्य में कोई दुखी नहीं था। पूरे राज्य में एकादशी का व्रत किया जाता था, तो व्रत नहीं करता था उसे दंड दिया जाता था। एक बार नारद मुनि राजा से मिलने आए। उन्होने राजा से कहा कि माता विद्याधर की कन्या मलयगंधिनी को कंकाल केतु नामक दानव पाताल में चंपावति नगर में ले गया है। नारद ने कहा कि राजन तुम जाओ और कन्या को बचाओ। कंकाल केतु का नाश उसके त्रिशुल से होगा। तुम उससे युद्ध करो और वध कर कन्या के साथ पूरे विश्व का कल्याण करों। नारद की आज्ञा मानकर राजा चंपावति पहुॅच गया। राजा को कन्या ने देखा और उसे शस्त्रागार में छिपने के कहा। इस बीच वहाॅ दैत्य पहुॅच गया और कन्या से कहा कि परसों तुम्हारा विवाह होगा। यह कहकर वह सो गया। राजा ने दैत्य को जगाकर उससे युद्ध किया और वध कर दिया। राजा और रानी दोनों अंवतिका नगरी में आकर शिव का पूजन करने लगे। रानी न अभीष्ट तृतीया का व्रत कर पार्वती को प्रसन्न किया और शिव के अंश वाले पुत्र का वरदान प्राप्त किया। रानी ने पुत्र को जन्म दिया तो मंत्री ने कहा कि रानी यदि तुम राजा को चाहती हो तो इस पुत्र का त्याग कर दो। पुत्र अभुक्त मूल में पैदा हुआ है जो सर्वत्र नाश करेगा। रानी ने मंत्री के कहने पर पुत्र का त्याग कर दिया और पुत्र को विकटा देवी के मंदिर में रख आई। उसी समय वहाॅ से योगिनियाॅ आकाश मार्ग से गमन कर रही थी वे उसे अपने साथ लेकर आ गयी। 16 वर्ष की आयु में राजकुमार अवन्तिका नगरी में आया और शिव की तपस्या करने लगा। शिव प्रसन्न होकर शिवलिंग से ज्योति रूप में प्रकट हुए और राजकुमार ने शिव से भवरूपी संसार से दूर करने का वरदान माॅगा। वीर बालक के पूजन के कारण शिवलिंग वीरेश्वर के नाम से वियात हुआ। इसके पश्चात राजकुमार ने सम्पूर्ण पृथ्वी पर साम्राज्य किया और अंतकाल में परमगति को प्राप्त हुआ। मान्यता है कि जो भी मनुष्य शिवलिंग के दर्शन कर पूजन करेगा उसके होम, दान, जप सब अक्षय होंगे और अंत काल में परम पद को प्राप्त करेगा।

47/84 नूपुरेश्वर महादेव

एक बार भगवान शंकर का गण नूपुर इंद्र की सभा में पहुॅचा। वहाॅ अप्सराएॅ नृत्य कर रही थी। नूपुर ने काम के वश में आकर उर्वशी को फूल फेंककर मारा, जिससे उर्वशी क्रोधित हो गई। कुबेर ने क्रोधित होकर नूपुर को मृत्युलोक में गिरने का श्राप दिया। वह पृथ्वी पर गिर पड़ा। तभी मनसा देवी ने प्रकट होकर नूपुर से कहा कि तुम महाकाल वन में जाओं और दक्षिण भाग में स्थित शिवलिंग का पूजन करो। नूपुर तुरंत महाकाल वन में गया और शिवलिंग का पूजन किया। शिवजी ने प्रसन्न होकर कहा कि नूपुर तुम्हारा कल्याण होगा। नूपुर के पूजन करने से यह शिवलिंग नूपुरेश्वर महादेव के नाम से वियात हुआ। मान्यता है कि जो भी मनुष्य शिवलिंग के दर्शन कर पूजन करता है वह सभी रोग व दुखों से मुक्त होता है।

48/84 अभयेश्वर महादेव

एक बार कल्प समाप्त होने पर चंद्र और सूर्य भी नष्ट होंगे। इस पर ब्रम्हा को चिंता हुई कि अब सृष्टि की स्थापना कैसे होगी, इस दुख के कारण आॅसू गिरे जिससे हारव और कालकेलि नामक दो दैत्य प्रकट हुए। सृष्टि पर कुछ न होने के कारण दोनों दैत्य ब्रम्हा को मारने के लिए दौडे। ब्रम्हा वहाॅ से भागे। उन्होंने समुद्र के बीच प्रकाश देखा और पुरूष से उसका परिचय पूछा तो उन्होंने बताया कि सृष्टि पालक विष्णु हूॅ। ब्रम्हा ने उनसे दोनों दैत्यों से रक्षा करने के लिए कहा। दैत्य विष्णु को भी मारने के लिए दौडे। ब्रम्हा और विष्णु दोनों समुद्र में छिप गए। यहाॅ ब्रम्हा ने महाकाल वन में नूपुरेश्वर के दक्षिण में स्थापित शिवलिंग का पूजन करने के लिए कहा। ब्रम्हा ओर विष्णु दोनों महाकाल वन पहुॅचे और शिवलिंग का पूजन किया। शिव ने प्रसन्न होकर दर्शन दिए। शिव ने भय का कारण पूछा तो ब्रम्हा ने बता दिया। शिव ने दोनों को पेट में छिपा लिया और कुछ देर बाद जब दोनों बाहर निकले तो दोनों दैत्य भस्म हो चुके थे। ब्रम्हा और विष्णु ने शिव से वरदान मांगा कि जो भी मनुष्य शिवलिंग के दर्शन करेगा उसे आप अभयदान देंगे। तब से ही शिवलिंग अभयेश्वर महादेव के नाम से वियात हुआ। मान्यता है कि जो भी मनुष्य शिवलिंग का दर्शन कर पूजन करता है उसे धन, पुत्र और स्त्री का वियोग नहीं होता है। संसार के समस्त सुखों को भोग कर अंतकाल में परमगति को प्राप्त करता है।

49/84 प्रथाकेश्वर महादेव

अंगराज के पुत्र वंेन के अंगों के दोहन से पृथु नामक एक बालक का जन्म हुआ। पृयु महापराक्रमी और जगत वियात हुआ। पृथु के राज्य में हवन नहीं होते थे, वेद मंत्रों का उच्चारण भी नहीं होता था। सारी प्रजा हाहाकार कर रही थी। राजा ने क्रोध में आकर त्रिलोक को जलाने की इच्छा की। इसी समय नारद मुनि वहाॅ प्रकट हुए और राजा से कहा कि पृथ्वी ने अन्न का भक्षण किया है। इस कारण आप पृथ्वी का वध करें। राजा ने अग्नि अस्त्र पृथ्वी पर छोडा जिससे पृथ्वी जलने लगी। पृथ्वी गाय रूप लेकर राजा के पास आई और उससे क्षमा मांगी। पृथ्वी ने राजा से महा उसे जो चाहिए वह दोहन कर प्राप्त कर ले। राजा ने गाय रूपी पृथ्वी का दोहन कर हिमालय को कडा बनाकर अन्न और रत्न प्राप्त किए। प्रजा खुशहाल हो गई। इधर राजा का ध्यान गोवध की ओर गया। राजा पाप से दुखी होकर अपने प्राणों को त्यागने के लिए निकल पड़ा। नारद मुनि ने राजा से कहा कि आप अवन्तिका नगरी में अभयेश्वर महादेव के पश्चिम में स्थित शिवलिंग का दर्शन करो, आप निष्पाप हो जायेंगे और ऐसा ही हुआ। राजा प्रथु के दोष मुक्त होने से लिंग का नाम प्रथुकेश्वर हुआ।

50/84 स्थावरेश्वर महादेव

विश्वकर्मा की संज्ञा नामक पुत्री सूर्य की पत्नी थी। सूर्य का तेज न सह पाने के कारण उसने अपने समान एक अन्य स्त्री को उत्पन्न किया और उसे आज्ञा दी की तुम सूर्य की सेवा करना और उन्हें मेरा पता कभी मत बताना। सूर्य ने उस स्त्री को अपनी पत्नी संज्ञा माना और उससे एक पुत्र हुआ, जिसका नाम शनैश्चर हुआ। शनैश्चर के प्रभाव से सभी भयभीत हो गए। इंद्र ब्रहदेव के पास पहुॅचे और शनैश्चर के प्रभाव से सभी रक्षा करने की बात कहीं। ब्रहदेव ने सूर्य को समस्या बताई। सूर्य ने कहा कि आप ही शनिदेव को समझाएं, वह मेरी बात नहीं सुनता है। ब्रहदेव ने भगवान कृष्ण को यह समस्या बताई। कृष्ण ने देवों व ब्रम्हा को महादेव के पास जाने के लिए कहा। भगवान शंकर ने शनैश्चर को बुलाया और कहां कि तुम पृथ्वी लोक के प्राणियों को पीड़ा पहुॅचा रहा हो परंतु उनका कल्याण भी करना। बारह राशियों में अलग-अलग स्थानों पर रहने से तुम्हारा अलग-अलग प्रभाव होगा। अब तुम महाकाल वन में जाओं और पृथुकेश्वर के पश्चिम में स्थित लिंग का पूजन करों। वह लिंग तुम्हारे नाम स्थावर के नाम से स्थावरेश्वर के नाम से वियात होगा। शनैश्चर महाकाल वन में आए और शिवलिंग के दर्शन कर पूजन किया। मान्यता है कि जो भी मनुष्य स्थावरेश्वर का पूजन करता है वह सदा स्वर्ग में निवास करता है और उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है और ग्रह दोष नहीं लगता है।

51/84 शुक्लेश्वर महादेव

काफी समय पहले दैत्यों और देवताओं में युद्ध हुआ। दैत्यों के स्वामी जंभ और इंद्र के बीच वर्षो तक युद्ध हुआ। जिसमें दैत्य विजयी हुए और अंधकासुर ने स्वर्ग पर शासन शुरू कर दिया। एक दिन अंधकासुर का एक दूत कैलाश पर्वत पहुॅचा और भगवान शिव से कहा कि अंधकासुर ने कहा कि तुम कैलाश छोड दो और पार्वती को उसके पास भेज दो। इस पर शिव ने दूत से कहा कि वह अंधकासुर से कहे कि वह यहाॅ आकर युद्ध करे और शिव को हराकर पार्वती को ले जाए। यह सुनकर अंधकासुर अपनी सेना के साथ कैलाश पहुॅच गया। शिव ने शूल से प्रहार कर अंधकासुर को घायल कर दिया और पाताल तक घुमाया। अंधकासुर के रक्त से उसके जैसे कई दानव उत्पन्न होने लगे। तब शिव ने अपनी शक्ति से महादुर्गा को प्रकट किया और दुर्गा ने अंधकासुर का वध किया। आखिरकार अंधकासुर ने भगवान शिव की उपासना की। भगवान शिव ने उसे महाकाल वन में पृथुकेश्वर महादेव के पूर्व में स्थित शिवलिंग की उपासना करने के लिए कहा। शूल से मृत्यु प्राप्त होने के कारण शिवलिंग का नाम शूलेश्वर वियात हुआ। मान्यता है कि जो भी मनुष्य शूलेश्वर के दर्शन कर पूजन करता है वह सभी प्रकार के भय और दुखों से मुक्त होता है और अंतकाल में परमपद को प्राप्त होता है।

52/84 ओकारेश्वर महादेव

प्राचीन समय में शिव ने एक दिव्य पुरूष को प्रकट किया। पुरूष ने शिव से पूछा कि वह क्या कार्य करे तो शिव ने कहा तुम अपनी आत्मा का विभाग करो। वह पुरूष शिव की बात को न समझने के कारण चिंता में पड़ गया और उसके शरीर से एक अन्य पुरूष उत्पन्न हुआ, जिसे शिव ने ओंकार का नाम दिया। शिव की आज्ञा से ओंकार ने वेद, देवता, सृष्टि, मनुष्य, ऋषि उत्पन्न किये और शिव के समुख खडा हो गया। शिव ने प्रसन्न होकर आंेकार से कहा कि तुम अब महाकाल वन में जाओं और वहाॅ शूलेश्वर महादेव के पूर्व दिशा में स्थित शिवलिंग का पूजन करो आंेकार वहाॅ पहुॅचा और शिवलिंग के दर्शन कर उसमें लीन हो गया। ओंकार के शिवलिंग में लीन होने से शिवलिंग ओंकारेश्वर के नाम से वियात हुआ। मान्यता है कि जो भी शिवलिंग का दर्शन कर पूजन करता है उसे सभी तीर्थो का भी यात्रा के समान फल प्राप्त होता है।

53/84 विश्वेश्वर महादेव

काफी समय पहले विदर्भ नगर में राजा विदुरथ थे। एक बार वे शिकार के लिए वन में गए। वहाॅ उन्होंने मृग छाल पहनकर भगवान के ध्यान मग्न एक ब्राहम्ण की हत्या कर दी। इस पाप के कारण वह 11 अलग-अलग योगिनयों में जन्म लेता रहा। 11 वीं योनि में वह चांडाल पैदा हुआ और धन चुराने के लिए ब्राहम्ण के घर में घुसा और लोगों ने उसे पकड कर पेड पर टांग दिया। मरने के पूर्व तक चांडाल शूलेश्वर के उपर में स्थित एक शिवलिंग के दर्शन करता रहा। इस कारण वह करने के बाद स्वर्ग में सुख भोगता रहा। इसके बाद पृथ्वी पर वह विदर्भ नगरी में ही राजा विश्वेश हुआ। उसे अपने पूर्व जन्म की कथा याद रही। वह अवंतिका नगरी में स्थित शिवलिंग पर पहुॅचा और विधि विधान से भगवान का पूजन किया। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उससे वर मांगने के लिए कहा। राजा ने कहा कि इस संसार में किसी का भी पतन न हो और आपका नाम विश्वेश्वर के नाम से वियात हो। विश्वेश राजा को वरदान देने के कारण शिवलिंग विश्वेश्वर के नाम से वियात हुआ। मान्यता है कि जो भी मनुष्य विश्वेश्वर महादेव के दर्शन करता है उसके सात जन्मों के पापों का नाश होता है।

54/84 नीलकंठेश्वर महादेव

प्राचीन समय में राजा सत्य विक्रम थे। शत्रुओं ने उनका राज्य छीन लिया, जिससे वह वन में भ्रमण करने लगे। एक दिन उसने वन में भ्रमण करते हुए वशिष्ठ मुनि का आश्रम देखा। मुनि के पूछने पर राजा ने अपनी पूरी कहानी उनसे कह दी। वशिष्ठ मुनि ने राजा सत्य विक्रम से कहा कि आप अवंतिका नगरी में महाकाल वन के समीप जाऐं और वहाॅ आपको एक तपस्वी मिलेंगे। राजा वशिष्ठ मुनि की आज्ञा से महाकाल वन में आया और उस तपस्वी के दर्शन किए। तपस्वी ने अपनी हुंकार से उसे स्वर्ग की अप्सराएॅ और जल परियों के दर्शन करा दिए। राजा ने उनसे पूछा कि यह क्या था तो तपस्वी ने कहा कि अब तुम शत्रुओं के नाश के लिए महादेव का पूजन करें। शिवलिंग के दर्शन मात्र से राजा के शत्रु मरण को प्राप्त हो गए और राजा ने निष्कंटक पृथ्वी पर राज्य किया और अंत काल में परमपद को प्राप्त किया। मान्यता है कि कण्टेश्वर के दर्शन मात्र से मनुष्यों के सभी कंटक नाश होते है और वह शंकर के सानिध्य को प्राप्त करता है।

55/84 सिंहेश्वर महादेव

एक समय पार्वती ने भगवान शंकर को प्राप्त करने के लिए महान तप किया। उनके तप से तीनों लोक जलने लगे। इसे देखते हुए ब्रम्हा पार्वती के पास आए और उनसे कहा कि तुम किस कारण से तप कर रही हो, तुम जो भी चाहो वह मुझसे मांग लो। पार्वती ने कहा कि शिव मुझे काली कहते है मुझे गौर वर्ण चाहिए। इस पर ब्रम्हा ने कहा कि कुछ समय के बाद तुम्हारा मनोरथ पूरा होगा। ब्रम्हा के वचन सुनकर पार्वती को क्रोध आ गया, उनके क्रोध के कारण एक सिंह उत्पन्न हुआ। सिंह भूखा था और पार्वती को खाने के लिए आगे बढ़ा परंतु पार्वती के तप और तेज के कारण वह उन्हें खा नहीं सका और जाने लगा। उसे जाता देख पार्वती को उस पर दया आ गई और उन्होंने दूध की अमृत वर्षा की। इसके बाद सिंह फिर पार्वती के पास आया और उनसे कहा कि मैं माता को मारने का पापी हूॅ मुझे नर्क में जाना पडेगा। सिंह की बात सुनकर माता पार्वती ने उससे कहा कि तुम महाकाल वन में आओं ओर कंटेश्वर महादेव के पास एक आम लिंग है। उसका पूजन और दर्शन करो, तुम्हे पाप से मुक्ति मिलेगी। माता पार्वती के वचन सुनकर सिंह महाकाल वन में आया और यहाॅ आकर उसने शिवलिंग के दर्शन किये और दिव्य देह को प्राप्त किया। ममता के कारण पार्वती भी वहाॅ पहुॅची और सिंह के दर्शन के कारण शिवलिंग का नाम सिंहेश्वर रख दिया। उसी दौरान ब्रम्हा भी वहाॅ पहुॅचे और पार्वती से कहा कि तुम्हारे क्रोध के कारण यह सिंह उत्पन्न हुआ है यह तुम्हारा वाहन होगा। इसके बाद पार्वती का गौर वर्ण हो गया। मान्यता है कि जो भी मनुष्य सिंहेश्वर के दर्शन और पूजन करेगा वह अक्षय स्वर्ग में वास करेगा। दर्शन मात्र से सभी पापों का नाश होगा और उसकी सात पीढिया पवित्र हो जायेंगी।

56/84 रेवन्तेश्वर महादेव

सूर्य के तेज को न सहन कर पाने के कारण उनकी पत्नी संज्ञा उन्हें छोड कर चली गई और तप करने लगी। यह बात सूर्य को पता चली तो वे कुरूक्षेत्र पहुॅच गये। यहाॅ संज्ञा को सूर्य ने घोडी के रूप में देखा। तब वह भगवान के सामने गई और नासिक से अश्विनी कुमार नामक घोड़े के मुख वाले पुत्र को जन्म दिया। रेत से रेवन्तु पुत्र खडग और तलवार लेकर उत्पन्न हुआ। बाल्य काल में ही उसने तीनों लोक जीत लिये। सभी देवता घबरा कर ब्रम्हा की शरण में गए। ब्रम्हा ने सभी देवताओं को शिवजी के तेज के कारण सारी सृष्टि जल रही है। आप उनकी रक्षा करें। शिवजी ने अश्विनी कुमार का स्मरण किया और अश्विनी कुमार शिवजी के पास आ गया। शिवजी ने प्यार से उसे गोद में बैठाया और उससे कहा कि तुम महाकाल वन में कंटेश्वर के पूर्व में स्थित एक आम लिंग है और तुम उसका पूजन और दर्शन करो और वहीं निवास करो। देवता तुम्हारा पूजन करेंगे और तुम राजाओं के राजा होगे। अश्विनी कुमार शिवजी की आज्ञा से महाकाल वन में आया और वहां आकर शिवलिंग का पूजन किया। रेवन्तु के पूजन के कारण शिवलिंग रेवन्तेश्वर महादेव के नाम से वियात हुआ। मान्यता है कि जो मनुष्य शिवलिंग के दर्शन कर पूजन करता है उसकी पीढियों को सुख मिलता है तथा अन्त काल में स्वर्ग में वास करता है।

57/84 घंटेश्वर महादेव

भगवान शंकर ने पार्वती को कथा सुनाते हुए बताया कि गणों में सबसे प्रिय गण घंटा नाम का गण है। देवताओं के संगीत सभागृह में इच्छा से शामिल होने के लिए चतुर गंधर्वो में श्रेष्ठ चित्रसेन से मिले और सभा में शामिल होने का उपाय पूछा। उपाय बताने से पूर्व चित्रसेन ने गण की परीक्षा ली और संगीत सुनाने को कहा। गण से संगीत सुनने के बाद चित्रसेन प्रसन्न हुए और सभा में जाने की आज्ञा दे दी। थोडी देर के बाद वहाॅ भगवान शंकर का द्वारपाल आया और गण से कहा कि तुम महादेव को छोड़कर यहाॅ बैठे हो। तुम्हें ब्रम्हा की सभा में जाने की अनुमति नहीं मिलेगी। इतना सुन कर गण दूर जाकर बैठ गया। इसी प्रकार सोच विचार करते हुए एक वर्ष बीत गया परंतु ब्रम्हा की सभा में जाना नहीं हुआ। इतने में ही उसने वीणा हाथ में लिये नारद जी को ब्रम्हा की सभा में जाते हुए देखा। उन्हें देखकर गण ने कहा हे नारद मुनि आप ब्रम्हा जी को मेरे आने की सूचना करों। यह सुनकर नारद जी ने कहा हे गण ब्रम्हा ने मुझे जरूरी कार्य के लिए देवाचार्य ब्रहस्पति के पास भेजा है, मैं उनसे मिल कर आता हूॅ और उन्होंने भगवान शंकर को सारी बातें बताई। यह बात सुनकर शिव जी को गुस्सा आ गया। उन्होंने श्राप देते हुए गण से कहा कि तू पृथ्वी पर गिर पडेगा। श्राप युक्त होकर गण पृथ्वी पर देवदारू वन में गिर पडा। भगवान शिव ने कहा जो व्यक्ति अपने स्वामी को छोड़कर दूसरे की सेवा करेगा वह इसी प्रकार नर्क में जायेगा। देवदारू वन में गण को तपस्या करते हुए कुछ ऋषि मुनि मिले। गण ने विलाप करते हुए बताया कि नारद मुनि ने मेरे साथ छल किया है। अब मैं दोनों स्थानों से गया। गण का पश्चाताप देखकर भगवान शिव ने कहा तुम महाकाल वन में चले जाओं वहाँ रेवंतेश्वर के पश्चिम में अम लिंग है। तुम इस लिंग की पूजा करो यह लिंग तुम्हे सुख समृद्धि देगा और भविष्य में यह लिंग घंटेश्वर के नाम से जाना जायेगा। मान्यता है कि जो भी मनुष्य घंटेश्वर का दर्शन और पूजन करेगा उसे संगीत की सभी विधाओं का ज्ञान मिलेगा।

58/84 प्रयागेश्वर महादेव

प्रथम कल्प में स्वयंभू मनु राजा नाम के राजा हुआ करते थे। उनके पुत्र प्रियवत नाम के राजा परम धार्मिक हुए। इन्होंने यज्ञ करके अम दान दक्षिण देकर यज्ञों को समाप्त किया और अपने सात पुत्रों को सातों द्विपों का राजा बनाया और बद्रीनारायण की विशाल नगरी में तप करने चले गए। वे वहाॅ तपस्या में लीन हो गए। नगरी में विचरण करते हुए एक दिन नारद मुनि वहाॅ पहुॅचे और राजा से कहा, कि हे राजन मैंने श्वेत द्वीप के सरोवर में कन्या देखी है और उस कन्या से पूछा तुम इस विशाल द्वीप पर अकेले क्यूं रहती हो। नारद ने उस कन्या से उसका नाम पूछा तब कन्या ने कहा नारद तुम अपनी आंखे बंद करो तुम्हे सब पता चल जायेगा। नारद ने आंखे बंद की तो कन्या के स्वरूप में तीन दिव्य पुरूष दिखाई दिए। नारद ने अपनी शक्तियों को प्रयोग करके देखा पर वह उस कन्या के बारे में पता लगाने में असफल रहें। इसके बाद कन्या से नारद ने पूछा हे देवी आप कौन है, आपके सामने मेरी निपुण सावित्री माता हूॅ। सारी बाते बताते हुए नारद ने कहा राजन मैं अपनी सारी शक्तियों को भूल गया था। सावित्री माता ने मुझे कहा कि तुम प्रयाग राज्य में चले जाओं तब जाकर तुम्हे अपनी शक्तियों का आयास दोबारा हेागा। इतना कह कर प्रयाग के राजा ने नारद ने कहा हे राजन मुझे वेदों और शक्तियों के पुनः ज्ञान के लिए कोई मार्ग बताईए। राजन ने उपाय बताते हुए कहा मुनिवर आप महाकाल वन में चले जाइए। वहाॅ पर प्रयाग के राजा विराजमान है। यही पर सनातन ज्योतिष रूप में लिंग स्थित है, जिसकी तुम प्रयाग राजा के नाम से पूजा करों। भविष्य में इस शिवलिंग को प्रयागेश्वर महादेव के नाम से पूजा जाएगा। मान्यता है कि जो भी मनुष्य प्रयागेश्वर के दर्शन और पूजन करेगा वह अक्षय स्वर्ग में वास करेगा। दर्शन मात्र से सभी पापों का नाश होगा।

59/84 सिद्धेश्वर महादेव

काफी समय पूर्व अश्वशिरा नाम का एक राजा था। वह बडा ही धार्मिक और प्रजा पालक था। राजा यह अनुष्ठान कर राजा ने सिद्धि को प्राप्त किया था। एक बार उसके राज्य में कपिल मुनि और जैगीषव्य ऋषि का आगमन हुआ। राजा ने उनका समान किया और उनसे पूछा कि उसने सुना है कि भगवान विष्णु सर्वश्रेष्ठ है और उनके दर्शन और उनकी कृपा से मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है। फिर ऐसे भगवान विष्णु को कोई प्रणाम क्यों नहीं करता है। दोनों ऋषियों ने राजा से पूछा कि यह बात तुमसे किसने कही है। उन्होंने अपनी सिद्धि से राजा को उसकी राज्यसभा में भगवान के साथ सम्पूर्ण सृष्टि के दर्शन कराए। राजा ने कहा कि मैं आपकी सिद्धि को देखकर आश्चर्यचकित हूॅ। इस प्रकार की सिद्धि कैसे प्राप्त होगी। आप मुझे बताएॅ। राजा ने वचन सुनकर दोनों मुनियों ने कहा कि राजन आप महाकाल वन में सौभाग्येश्वर महादेव का पूजन करें, तो आपको आलौकिक सिद्धि प्राप्त होगी। मुनियों की बात सुनकर राजा तुरंत अवंतिका नगरी आया और यहाॅ दोनों मुनियों को देखा। राजा ने लिंग के मध्य भाग में भगवान विष्णु को बैठे देखा। इसके बाद राजा ने शिवलिंग का पूजन किया। सिद्धेश्वर महादेव ने उससे प्रसन्न होकर वरदान मांगने के लिए कहा। राजा ने कहा कि आपके दर्शन की इच्छा थी वह पूर्ण होगी। इस प्रकार राजा ने सिद्धि प्राप्त की और विष्णु रूप में शिवलिंग में लीन हो गया। मान्यता है कि जो भी मनुष्य सिद्धेश्वर के दर्शन करता है वह विभिन्न सिद्धियों को प्राप्त करता है और अंतकाल में मोक्ष को प्राप्त करता है।

60/84 मतंगेश्वर महादेव

द्वापर युग में एक ब्राहम्ण नामक पुत्र का जन्म हुआ। बालक अवस्था में ही मतंग क्रुर स्वभाव का हुआ। एक बार बालक मतंग अपनी माता की गोद में बैठकर लकडी से अपने पिता को मार रहा था। पास खडी एक गर्दभी ने उससे कहा कि यह चांडाल नहीं, यह ब्राहम्ण है। गर्दभी के वचन सुनकर बालक ने उससे कहा कि मुझे बताओं कि मैं चांडाल कैसे हुआ। गर्दभी ने उससे उसकी पूरी कथा कह सुनाई। मतंग ने निश्चय किया कि वह ब्राहम्णत्व को प्राप्त करेगा। ऐसा प्रण कर वह तपस्या करने के लिए चला गया। कई वर्षो तक तपस्या करने के बाद इंद्र उसके सामने प्रकट हुए और उससे कहां कि तुम्हे जो चाहिए मांग लो। मतंग ने इंद्र से कहा कि उसे ब्राहम्णत्व नहीं मिल सकता। इसके बाद भी मतंग ने कई हजार वर्षो तक तपस्या की और इंद्र ने कई बार उसे समझाने का प्रयास किया, परंतु मतंग ने अपना प्रण नहीं त्यागा, उसने गया में जाकर तप करना प्रारंभ कर दिया। एक बार फिर इंद्र उसे समझाने के लिए आए तो उसने इंद्र से कहा कि मुझे ब्राहम्णत्व कैसे प्राप्त होगा, मुझे उपाय बताएं। इंद्र ने कहा कि अवंतिका नगरी के महाकाल वन में सिद्धेश्वर महादेव के पूर्व में एक शिवलिंग है तुम उसका पूजन और दर्शन करों। मतंग इंद्र की बात सुनकर अवंतिका नगरी में आया और यहां शिवलिंग का पूजन और दर्शन किया। मतंग के पूजन से महादेव ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिए और मतंग ब्रम्हलोक को प्राप्त हुआ। मतंग के पूजन के कारण शिवलिंग मतंगेश्वर महादेव के नाम से वियात हुआ। मान्यता है कि कोई भी क्रुर मनुष्य भगवान का पूजन करेगा वह शुद्ध होकर ब्रम्हलोक को प्राप्त करेगा।

61/84 सौभाग्येश्वर महादेव

काफी समय पहले अश्वाहन नामक एक राजा हुआ करते थे। राजा धर्मात्मा ओर किर्तिवर्धन थे। उनके राज्य में प्रजा सुखी रहती थी। उनकी पत्नी थी काशी राजा की पुत्री मदन मंजरी। वह भी अत्यंत सुंदर और गृहकार्य में निपुण थी। पति का हित चाहने वाली व धर्मात्मा थी। पूर्व कर्म के कारण वह दुर्भगा थी। राजा अश्वाहन को वह प्रिय नहीं थी। रानी के स्पर्श मात्र से राजा का शरीर जलने लगता था। एक बार राजा ने क्रोध में आकर आदेश दिया कि रानी को वन में छोडकर आ जाए। रानी वन में अपने भाग्य को कोसने लगी। इसी समय एक तपस्वी उसे नजर आया। रानी ने उनसे अपनी पूरी व्यथा कही और पूछा कि उसे सौभाग्य कैसे प्राप्त होगा। तपस्वी ने ध्यान कर रानी को बताया कि तुम्हारे विवाह के समय तुम्हारे पति को पाप ग्रहों ने देखा है इस कारण वह तुम्हे पे्रम नहीं करता है। तुम अवंतिका नगरी में स्थित महाकाल वन में जाओं ओर वहाॅ मातंगेश्वर महोदव का पूजन करो। तुम्हारे पूर्व इंद्राणी ने भी उनका पूजन कर इंद्र को प्राप्त किया था। रानी ने अवंतिका नगरी में महाकाल वन पहुॅच कर भगवान का दर्शन किया। रानी के दर्शन मात्र से राजा को रानी का स्मरण आया और राजा ने जमदग्नि मुनि से रानी का पता पूछा। मुनि ने कहा कि रानी महाकाल वन में सौभाग्येश्वर महादेव का पूजन कर रही है। राजा वहाॅ पहुॅचा और रानी को पाकर प्रसन्न हुआ। राजा को रानी के मिलने से उनके एक पुत्र हुआ। जिसका नाम व्रत रखा गया। मान्यता है कि जो भी सौभाग्येश्वर महादेव के दर्शन कर पूजन करता है उस पर ग्रह दोष नहीं लगता है।

62/84 रूपेश्वर महादेव

प्राचीन काल में राजा थे पद्य। वे महापराक्रमी और धर्मनिष्ठ थे। एक बार राजा अपनी सेना के साथ शिकार करने के लिए वन में गया। वहाॅ एक मृग का पीछा करते हुए दूसरे वन में चला गया। प्यास से व्याकुल राजा एक आश्रम मंे पहुॅच गया। यहा राजा को देख मुनि कन्या सामने आई और राजा का आदर सत्कार किया। राजा ने उससे पूदा यह किसका आश्रम है और तुम कौन हो। कन्या नेक हा कि यह मुनि कण्व का आश्रम है और मैं उनकी कन्या हूॅ। मैं मुनि को अपना पिता मानती हूॅ मेरे पिता कौन है मुझे नहीं पता। कन्या के रूप में मोहित होकर राजा ने उससे विवाह का प्रस्ताव दिया। कन्या ने कहा कि मुनि कण्व आते ही होंगे वे ही मेरा दान करेंगे। राजा ने कन्या से कहा कि मैं इतनी देर प्रतीक्षा नहीं कर सकता। मैं तुमसे अभी गंधर्व विवाह करता हूॅ। कन्या ने इस पर स्वीकृति दे दी। इसी बीच मुनि कण्व ीाी वहाॅ आ गए और राजा और कन्या को विवाह बंधन में देख क्रोधित होकर दोनों को श्राप दिया कि वे दोनो कुरूप हो जाए। दोनों ने मुनि से क्षमा मांगी और पुनः रूपवान होने का उपाय पूछा। मुनि ने उनसे कहा कि तुम दोनों जल्द ही महाकाल वन में पशुपतेश्वर महादेव के पूर्व मंे स्थित शिवलिंग के दर्शन करो, तुम दोनों रूप को प्राप्त करोगे। राजा और कन्या तुरंत महाकाल वन में आए और शिवलिंग के दर्शन किए। शिवलिंग के दर्शन मात्र से दोनों पहले से भी अधिक रूपवान हो गये और फिर राज्य में लौट गए और अंतकाल में स्वर्ग को प्राप्त किया। मान्यता है कि जो भी रूपेश्वर महादेव के दर्शन और पूजन करता है वह रूपवान होगा। अंतकाल में शिवलोक को प्राप्त करेगा।

63/84 शहस्त्रदानुकेश्वर महादेव

काफी समय पहले एक राजा थे विदूरथ। उनके दो पुत्र थे सुनीति और सुमति। एक बार राजा शिकार करने के लिए वन में गए। वहाॅ उन्होंने एक बडा गढ्डा देखा, उसे आश्चर्य हुआ। तभी वहाॅ एक तपस्वी आए और उन्होंने बताया कि यहां से रसातल में रहने वाला कुंजभ नाम का दानव आता-जाता है। आप उसका वध करो। राजा अपने महल लौटा और वहाॅ उसने अपने पुत्रों और मंत्रियों से विचार विमर्श किया। कुछ दिन बाद कुंजभ ने वहाॅ आश्रम से एक मुनि कन्या मुदावति का हरण कर लिया। राजा ने क्रोध में आकर अपने दोनों पुत्रों और और सेना को आदेश दिया कि वह कुंजभ का वध कर दे। राजा की सेना और उसके पुत्रों ने कुंजभ से युद्ध शुरू कर दिया। अमोध मूसल के कारण कुंजभ ने सेना का नाशा कर दिया और राजा के दोनों पुत्रों को बंदी बना लिया। राजा को पता चला तो वह दुखी हो गया। इसी दौरान वहाॅ मार्कण्डेय मुनि आए और राजा से कहा कि आप महाकाल वन में जाओं और वहाॅ रूपेश्वर महादेव के दक्षिण में स्थित शिवलिंग का पूजन करों। उनसे तुम्हे धनुष प्राप्त होगा, जिससे तुम कुंजभ का नाश कर सकोगे। राजा तुरंत आवंतिका नगरी में महाकाल वन में पहुॅचा और यहां उसने शिवलिंग का पूजन किया। यहां भगवान शिव ने उसे एक धनुष प्रदान किया। राजा धनुष और सेना के साथ युद्ध करने के लिए पहुंच गया। तीन दिन तक युद्ध चलता रहा और राजा ने धनुष के बल पर कुंजभ का वध कर दिया और कन्या और पुत्रों के साथ अपने राज्य लौट आया। राजा ने शिवलिंग से धनुष प्राप्त किया था, इस कारण शिवलिंग धनुसहस्त्रेश्वर के नाम से वियात हुआ। मान्यता है कि जो भी मनुष्य शिवलिंग के दर्शन कर पूजन करता है उसके शत्रुओं का नाश होता है और उसे नरक में वास नहीं करना पडता है।

64/84 पशुपतेश्वर महादेव

प्राचीन समय में एक राजा थे पशुपाल। वे परम धर्मात्मा और पशु के पालन में विशेष ध्यान रखते थे। एक बार राजा समुद्र के किनारे गए और उन्होंने वहाॅ पाॅच पुरूषों और एक स्त्री को देखा। राजा उन्हें देख मूच्र्छित हो गया। वे पांचों पुरूष और स्त्री उसे घर ले आए। राजा जब होश में आया तो उसने उनसे युद्ध किया। इस बीच पांच पुरूष और आ गए। राजा उनमें से किसी को भी मार नहीं पाया और वे दसों पुरूष और स्त्री राजा के शरीर में लीन हो गए। राजा दुखी हो गए। इस बीच वहाॅ नारद मुनि आए और राजा ने उन्हें पूरी बात बताई और उनसे पुरूषों और स्त्री का परिचय पूछा। नारद मुनि ने कहा कि जो दस पुरूष थे उनमें पाॅच ज्ञानेन्द्रि और पाॅच कामेन्द्रि थी और जो स्त्री थी वह मन रूप बुद्धि थी। वे क्रोधवश तुम्हारे पास आए थे। तुम्हारे पितामह ने यज्ञ में महादेव का भाग और स्थान नहीं रखा था। जिस पर महादेव ने आपने धनुष से देवताओं को दंड दिया, जिससे सभी पशु योनि को प्राप्त हुए। सभी देवतओं ने ब्रम्हा से निवेदन किया और फिर भगवान शिव के पास पहुॅचे। यहा शिव ने प्रसन्न होकर उनसे कहा कि आप सभी महाकाल वन में जाओं और वहाॅ लिंग रूपी पशुपतेश्वर महादेव के दर्शन करो। सभी देवता महाकाल वन में आए और यहां शिवजी के दर्शन किए और पशु योनि से मुक्त हुए। मान्यता है कि जो भी मनुष्य पशुपतेश्वर के दर्शन करता है और पूजन करता है उसके पूर्वज भी पशु योनि से मुक्त हेा जाते है।

65/84 श्री ब्रम्हेश्वर महादेव

चैरासी महादेव मंदिरों में श्री ब्रम्हेश्वर महादेव का मंदिर खटीकवाडा (ढाबा रोड के पास) में स्थित है। भगवान विष्णु का संकट नष्ट करने तथा ब्रम्हाजी द्वारा पूजे जाने के कारण श्री ब्रम्हेश्वर की प्रसिद्धि है। एक समय जब आसुरी शक्तियाॅ प्रबल हो रही थी तब उनका नेतृत्व करने वाला पुलोमा नामक दैत्य अपने पराक्रम से इन्द्र सहित अनेक देवताओं को हराकर विष्णुलोक पहुंचा। विष्णु को सोया हुआ देखकर वह प्रतीक्षा करने लगा। इस बीच ब्रम्हकमल पर स्थिति ब्रम्हा ने पुलोमा को देख लिया। साथ ही विष्णुजी के जागने पर उन्हें पुलोमा के आने का कारण भी बतला दिया। पुलोमा के आतंक से भयभीत विष्णुजी ने ब्रम्हाजी से कहा कि तुम अभी महाकाल वन स्थित सातकल्प से पूर्व उत्पन्न शिवलिंग की अराधना कर उनसे अस्त्र-शस्त्र युक्त दिव्य जल यहा तुरंत लाओ। इससे उस जल को पुलोमा ओर उसको सेना पर छिडककर पराजित किया जा सके। ब्रम्हाजी ने विष्णुजी के आग्रह पर अवंतिकापुरी में आकर इस तेजोमय शिवलिंग की उपासना की तथा वह जल प्राप्त कर विष्णुजी के संकट को दूर किया। ब्रम्हाजी द्वारा आराध्य इस शिवलिंग को तभी से ब्रम्हेश्वर कहा जाने लगा।

66/84 जल्पेश्वर महादेव

सालों पहले जल्द नाम का राजा हुआ। वह तेजस्वी था। उसके पांच पुत्र सुबाहु, शत्रुमहि, जय, विजय और विक्रांत थे। राजा ने पूर्व दिशा का राज्य सुबाहू, दक्षिण का शत्रुमहि, पश्चिम दिशा का जय और उत्तर दिशा का विजय और मध्य का विक्रांत को दिया और खुद तपस्या करने चला गया। इधर विक्रांत ने मंत्री के कहने पर चारों भाईयों के राज्य पर अधिकार कर लिया और सभी का वध कर दिया। यह बात राजा को पता चली तो वह शोक जताने लगा। राजा ने वन में ही वशिष्ठ मुनि से बात कही और कहा कि युद्ध में ब्राम्हणों की हत्या हुई है। उसके पुत्रों की हत्या हुई इसका पाप उसे मिलेगा। उसने मुनि से पाप कर्मो से मुक्त होने का उपाय पूछा। मुनि ने कहा कि राजन आप महाकाल वन में कुक्कुटेश्वर महादेव के पश्चिम में स्थित शिवलिंग का पूजन करें। उसका पूजन कर परशुराम भी पाप मुक्त हुए थे। राजा मुनि की आज्ञा से महाकाल वन में आया और शिवलिंग का पूजन किया। भगवान शंकर प्रसन्न हुए और आकाशवाणी हुई कि राजा तुम निष्पाप हो। जो हुआ वह भाग्य के कारण हुआ। तुम वरदान मांगो। राजा ने कहा कि मुझे जन्मों के बंधन से मुक्ति मिले और मेरी याति रहे। वरदान के कारण शिवलिंग जल्पेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मान्यता है कि जो भी मनुष्य जल्पेश्वर महादेव का दर्शन पूजन करता है उसे धन ओर पुत्र का वियोग नहीं होता है।

67/84 केदारेश्वर महादेव

सृष्टि को स्थापना के समय हिम युग से सभी देवी-देवताओं परेशान हो गए और शीत पीडा से परेशान होकर वे ब्रम्हा की शरण में गए। ब्रम्हा के सामने देवताओं ने स्तुति करते हुए कहा हम हिमाद्रि पर्वत से पीडित होकर आपकी शरण में आए है। यह सुनकर ब्रम्हा ने कहा कि हिमालय पर्वत पर तो भगवान शंकर के असुर रहते है। इस परेशानी का हल तो भगवान शंकर ही करेंगे। इसके बाद देवता भगवान शंकर की शरण में चले गए और अपनी परेशानी बताई। इस पर भगवान शंकर ने हिमालय को बुलाया और कहा हे हिमालय तुम्हे मर्यादा में रहना चाहिए, तुम्हारे कारण देवताओं और गंधर्व को परेशान होना पड रहा है। इतना कह कर भगवान शंकर हिमालय पर क्रोधित हेाकर लिंग मूर्ति रूप में निवास करने लगे। साथ ही पर्वत से मंत्रों के उच्चारण से जल की धारा निकली। यहां पर निवास करने के कारण भगवान शंकर केदारेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए। यह सब देखकर सभी देवता केदारेश्वर के स्थान पर प्रस्तुत हुए और भगवान को धन्यवाद दिया। कुछ समय बाद वहाॅ धूल तथा हिम के कारण अंधकार हो गया। यात्री केदारेश्वर को इधर उधर ढूंढने लगे। सभी शास्त्र महादेव की निंदा करने लगे। निंदा सुनकर महादेव ने आकाशवाणी करते हुए कहा कि जो भी मनुष्य पुराणों व शास्त्रों की निंदा करते है वे नर्क को प्राप्त होते है। यहा पर सदा केदारेश्वर है परंतु वह आठ माह दिखाई नहीं देंगे। इसलिए मेरे दर्शन अभी नहीं होंगे। अगर तुम्हारे इच्छा सदा पूजन की है तो मेरे वचनों को ध्यान से सुनो। क्षेत्रों में उत्तर क्षेत्र अवंतिकापुरी है। वहाॅ क्षिप्रा के किनारे सोमेश्वर से पश्चिम में स्थान है केदारेश्वर। जितने माह में केदारेश्वर में मेरे दर्शन नहीं होंगे, उतने समय में यही अवंकिा नगरी में विश्राम करूॅगा। मान्यता है कि जो भी मनुष्य केदारेश्वर महादेव के दर्शन करता है वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

68/84 पिशाचमुक्तेश्वर महादेव

कलियुग में सोमा नाम का शूद्र हुआ करता था। धनवान होने के साथ ही सोमा नास्तिक था। वह हमेशा वेदों की निंदा करता था। उसको संतान नहीं थी। सोमा हमेशा हिंसावृति में रहकर अपना जीवन व्यतीत करता था। इसी स्वभाव के कारण सोमा कष्ट के साथ मरण को प्राप्त हुआ। इसके बाद सोमा पिशाच्य योनि को प्राप्त हुआ। नग्न शरीर और भयावह आकृति वाला पिशाच्य मार्गो पर खडे होकर लोगो को मारने लगा। एक समय वेद विद्या जानने वाले सदा सत्य बोलने वाले कहीं जा रहे थे, पिशाच्य उनकों खाने के लिए दौडा। तभी ब्राम्हण को देखकर पिशाच्य रूक गया और संज्ञाहीन हो गया। पिशाच्य को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि उसके साथ हो गया रहा है। ब्राम्हण ने पिशाच्य से पूछा तुम मुझसे घबरा क्यों रहे हो। पिशाच्य ने कहा तुम ब्रम्ह राक्षस हो इसलिए मुझे तुमसे भय लग रहा है। यह सब सुनकर ब्राम्हण हॅसने लगे ओर पिशाच्य को पिशाच्य योनि से मुक्त होने का मार्ग बताया। उन्होंने कहा द्रव्य हरण करने और देवता के द्रव्य को चुराने वाला पिशाच्य योनी को प्राप्त होता है। ब्राम्हण के कटु वचनों को सुनकर पिशाच्य ने मुक्ति का मार्ग पूछा। ब्राम्हण ने बताया कि सब तीर्थो में उत्तर तीर्थ है अवंतिका तीर्थ जो प्रलय में अक्षय रहती है। वहाॅ पिशाच्य का नाश करने वाले महादेव है। ब्राम्हण के वचनों को सुनकर वह जल्दी से वहाॅ से महाकाल वन की ओर चल दिया। वहाॅ क्षिप्रा के जल से स्नान कर उसने पिशाच मुक्तेश्वर के दर्शन किए। दर्शन मात्र से पिशाच दिव्य देव को प्राप्त हो गया। मान्यता है कि जो भी मनुष्य पिशाच मुक्तेश्वर महादेव का दर्शन कर पूजन करता है उसे धन और पुत्र का वियोग नहीं होता और संसार में सभी सुखों को भोगकर अंतकाल में परमगति को प्राप्त करता है।

69/84 संगमेश्वर महादेव

बहुत पुरानी बात है। कलिंग देश में सुबाहु नाम के राजा हुआ करते थे। उनकी पत्नी दृढधन्वा (कांचीपुरी के राजा) की कन्या विशालाक्षी नाम की थी। दोनों परस्पर प्रेम से रहते थे। राजा को माथे में दोपहर में रोज पीडा हुआ करती थी। निपुण वैद्यों ने ओषधियाू दी किन्तु पीडा दूर नहीं हुई। रानी ने राजा से पीडा का कारण पूछा। राजा ने रानी को दुखी देखकर कहा, पूर्व जन्म में कर्म से शरीर को सुख-दुख हुआ करता है। इतना सुनने के बाद भी रानी संतुष्ट नहीं हुई। तब राजा ने कहा मैं इसका कारण यहा नहीं कहूंगा। महाकाल वन में चलों वहा पूरी बात समझा सकूंगा। सुबह होते ही राजा सेना और रानी के साथ महाकाल वन अवंतिका नगरी की ओर चल दिए। पाताल में गमन करने वाली गंगा तथा नीलगंगा और क्षिप्रा इनका जहां संगम हुआ है वहाॅ ठहरा और इनके पास जो महादेव है उनका नाम संगमेश्वर है। राजा ने क्षिप्रा तथा पाताल गंगा का जल लेकर महादेव का पूजन किया। इतना सब देखकर रानी ने फिर पूछा राजन अपने दुख का कारण बताइए। राजा ने हंसते हुए कहा रानी आज तो थक गए है कल बतायेंगे। सुबह रानी ने फिर पूछा कि अब तो बता दीजिए। तब राजा ने कहा पूर्व जन्म में नीच शुद्र था। वेदों की निंदा करने के साथ लोगों के साथ विश्वासघात करता था। तुम भी मेरे साथ इस कार्य में भागीदारी निभाती थी। हमसे जो पुत्र उत्पन्न हुआ वह भी पापी हुआ तथा बारह वर्ष तक अनावृष्टि के कारण प्राणी मात्र दुखी हो गए भयभीत रहने लगा। उस समय मुझे वियोग हो गया। मैं अकेला रहने लगा। तब मुझे वैराग्य प्राप्त हुआ और अंत में मैंने कहा धर्म ही श्रेष्ठ है, पाप करना बुरा है। मैंने अंत समय में धर्म की प्रशंसा की थी, इसलिए क्षिप्रा जी में मत्स्य बना और तुम उसी वन में श्येनी (कबूतनी) बन गई। एक दिन दोपहर को अश्लेषा के सूर्य (श्रावण) में त्रिवेणी से बाहर निकला और तुम्हे लेकर संगमेश्वर के पास ले गाय। पारधि ने हम दोनों का शिकार कर लिया। हमने अंत समय में संगमेश्वर के दर्शन किये थे, इसलिए पृथ्वी पर जन्म मिला है। सारी बातें बताकर राजा ने कहा रानी अब मैं हमेशा संगमेश्वर महादेव के पास रहूॅगा। रानी यदि तुम्हे जाना हो तो पुनः राजमहल लौट जाओं। रानी ने कहा राजन जैसे शिव बिना पार्वती, कृष्ण बिना राधा ठीक उसी प्रकार मैं आपके बिना अधूरी हूॅ। मान्यता है कि पूर्व जन्मों में वियोग से मरे हुए पति पत्नी संगमेश्वर महादेव के दर्शन से मिल जाते है।

70/84 दुर्दरेश्वर महादेव

नेपाल में एक राजा दुधर्ष था। उसकी तीन रानियां थी। एक समय मृग्या करते हुए वह एक तालाब पर पहुंचा। वहाॅ उसे एक सुंदर कन्या दिखाई दी। वे दोनों एक-दूसरे पर मोहित हो गये। उसने कन्या से उसका परिचय पूछा। कन्या ने कहा वह कल्प मुनि की कन्या की कन्या है। आप मुनि के पास जाकर मेरा हाथ मांगो। राजा ने वैसा ही किया। कल्प मुनि ने कन्या का राजा से विवाह करा दिया। राजा वहीं मुनि के आश्रमों में रहने लगे। कुछ दिन बाद एक राक्षस उस कन्या को हरकर ले गया। राजा बहुत दुःखी हुआ। मुनि ने उसे समझाया और अवंतिकापुरी में ब्रम्हेश्वर के पश्चिम में स्थित लिंग के पूजन की सलाह दी। राजा तुरंत अवंतिका नगरी आया और उसने वैसा ही किया जैसा मुनि ने कहा था। शिवलिंग की पूजा करते ही उसे मंदिर में उसकी स्त्री प्राप्त हो गई। तब राजा उसे लेकर नेपाल चला गया। दुधर्ष राजा के पूजन करने से इस शिवलिंग का नाम दुर्धरेश्वर के नाम से वियात हुआ। मान्यता है कि जो मनुष्य रविवार की संक्रांति पर इस शिवलिंग का पूजन करता है उसे शिवलोक प्राप्त होता है।

71/84 योगेश्वर महादेव

काफी समय पहले एक राजा थे शांतनु। धर्मात्मा और वेदों को जानने वाले राजा एक दिन सेना के साथ शिकार करने लिए वन में गए। वहा एक स्त्री को देखा। राजा ने उससे परिचय पूछा तो स्त्री ने कहा कि राजन आप मेरा परिचय न पूछें, आप जो चाहते है उसके लिए वह तैयार है। इसके लिए उसके लिए वह तैयार है। इसके लिए उसने एक शर्त रखी की वह रानी बनने के बाद जो भी करें, राजा कभी उससे उस बारे में कुछ नहीं पूछेगा। राजा ने स्वीकृति दी और स्त्री से विवाह कर लिया। विवाह के बाद रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया और तुरंत नदी में प्रवाहित कर दिया। वचन के कारण राजा रानी से प्रश्न न पूछ सका। आठवें पुत्र को रानी नदी में प्रावाहित करने जा रही थी, तभी राजा को रोका और कहा कि तुम इस पुत्र को नदी में प्रवाहित मत करों। रानी ने कहा कि आपको पुत्र चाहिए मैं आपको पुत्र सौपती हूॅ और वचन को तोडने के कारण मैं आपका त्याग करती हूॅ। मैं जन्हू की कन्या गंगा हूॅ और देवताओं के कार्य सिद्ध करने के लिए मैंने आपसे विवाह किया था। यह आठ वसु है जो वशिष्ठ ऋषि के श्राप के कारण मनुष्य योनि में आए थे। गंगा वहा से आगे जाकर पुत्र हत्या के पाप के कारण रूदन करने लगी। गंगा के रूदन को सुनकर नारद मुनि आए और रूदन का कारण पूछा। गंगा ने कहा महर्षि मैंने पुत्रों की हत्या की है। मुझे इस पापकर्म से मुक्ति कैसे मिलेगी। नारद मुनि ने कहा गंगा तुम अवंतिका नगरी में जाओं जहा तुम्हारी सखी क्षिप्रा रहती है। वहाॅ दुर्धेश्वर महादेव के दक्षिण में स्थित महादेव का पूजन करों, जिससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाऐंगे। गंगा अवंतिका नगरी आई और सखी क्षिप्रा के साथ मिलकर भगवान शिव का पूजन किया। फिर वहाॅ सूर्य की पुत्री यमुना और फिर सरस्वती भी आ मिली। इस बीच इंद्र ने नारद मुनि से पूछा कि मुनिवर प्रयाग नजर नहीं आ रहा तो नारद ने कहा कि वह महाकाल वन में गया होगा, जहां चार नदियों का मिलन हो रहा है। प्रयाग के बाद इन चार नदियों के मिन के कारण शिवलिंग प्रयागेश्वर महादेव के नाम से वियात हुए। मान्यता है कि जो भी मनुष्य प्रयागेश्वर महादेव के दर्शन कर पूजन करता है उसके सभी पापों का नाश होता है और मोक्ष को प्राप्त करता है।

72/84 चन्द्रदित्येश्व महोदव

सालों पहले एक दैत्य था शंबरासुर। उसने युद्ध में देवताओं को जीत लिया और स्वर्ग पर राजय शुरू कर दिया। युद्ध में हारे देवता छिप गए, वहीं चंद्र और सूर्य भी भय के कारण भागने लगे। चंद्र के पुत्र अरूण चंद्र को राहु से युद्ध के दौरान पिता को दूसरे स्थान पर ले गया। सूर्य और चंद्र वहाॅ से भगवान विष्णु के पास गए और स्तुति कर रक्षा की प्रार्थना की, भगवान विष्णु ने उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर उनसे कहा कि तुम महाकाल वन में जाओं और महाकालेश्वर के उत्तर में स्थित शिवलिंग का पूजन करो, उनकी ज्वाला से शंबरासुर अपनी सेना के साथ जलकर भस्म हो जाएगा। सूर्य और चंद्र दोनों महाकाल वन में आए और शिवलिंग का पूजन किया। शिवलिंग से निकली ज्वाला से शंबरासुर सेना सहित नष्ट हो गया और स्वर्ग पर फिर देवता आसीन हो गए। तभी आकाशवाणी हुई कि चंद्र और सूर्य के साहस और यहाॅ स्तुति करने के कारण शिवलिंग चंद्रादित्येश्वर के नाम से वियात होगा। मान्यता है कि जो भी मनुष्य शिवलिंग के दर्शन कर पूजन करता है उसके माता-पिता के कुल में सभी पवित्र हो जाते है और चंद्र व सूर्य लोक में निवास करते है।

73/84 कर्मेश्वर महादेव

बहुत वर्ष पूर्व अयोध्या में एक राजा थे वीरकेतु। एक बार वे वन में शिकार करने के लिए गए। वहाॅ उन्होंने कई जंगली जानवरों का शिकार किया। फिर उन्हें कोई पशु नजर नहीं आया। अचानक उन्हे एक करभ (ऊट) नजर आया और उन्होंने उसे तीर मार दिया। वह ऊँट तीर लगने के बाद वहाॅ से भागा। राजा वीरकेतु उसके पीछे भाग। कुछ देर बाद ही वह ऊँट गायब हो गया। राजा भटकता हुआ मुनियों के आश्रम में पहुंच गया। ऋषियों ने राजा वीरकेतु से कहा राजन काफी वर्ष पूर्व राजा हुए करते थे, जिनका नाम धर्मध्वज था। एक बार वे शिकार करने के लिए वन में गए वहा उन्होंने मृगचर्म पहने ब्राम्हण का उपहास उडाया। इस पर ब्राम्हण ने राजा को श्राप दिया कि वह करभ योनि में चले जाए। राजा ने दुखी होकर ब्राम्हण से विनती की तो ब्राम्हण ने कहा कि आयोध्या के राजा वीरकेतु के बाण से घायल होकर तुम महाकाल वन में स्थित शिवलिंग का दर्शन करना उससे तुम्हे ऊँट की योनि से मुक्ति मिलेगी और तुम शिवलोक को प्राप्त करोगे। तो राजन वह ऊँट महाकाल वन में गया है तुम भी वहा जाओं और शिवलिंग के दर्शन कर चक्रवर्ति सम्राट हो जाओंगे। राजा तुरंत महाकाल वन आया। यहां उसने धर्मध्वज को एक विमान से शिवलोक जाते देखा और फिर शिवलिंग का पूजन कर चक्रवर्ती सम्राट हुआ। ऊँट के मुक्ति प्राप्त करने के कारण शिवलिंग करभेश्वर महादेव के नाम से वियात हुआ। मान्यता है कि जो भी मनुष्य करभेश्वर महादेव के दर्शन करता है वह धनवान होता है, उसे कोई व्याधि नहीं होती है उसके कोई पितृ पशु योनी में है तो उन्हें मुक्ति मिलती है और अंतकाल में मनुष्य शिवलोक को प्राप्त करता है।

74/84 राजशालेश्वर महादेव

काफी वर्ष पूर्व पृथ्वी पर कोई राजा नहीं बचा था। ब्रम्हा को चिंता हुई राजा नहीं हुआ तो प्रजा पालन कौन करेगा। राजा नहीं होगा तो यज्ञ, हवन, धर्म की रक्षा कौन करेगा। इस दौरान उन्होंने राजा रिपंजय को तपस्या करते देखा और उससे कहा कि राजा अब तपस्या त्याग कर प्रजा का पालन करों। सभी देवता तुम्हारे वश में रहेंगे और पृथ्वी पर राज करोगे। राजा ने ब्रम्हा की आज्ञा मानकर सभी देवताओं को स्वर्ग में राज करने के लिए भेज दिया और स्वयं पृथ्वी पर शासन करने लगा। राजा के प्रताप को देख इंद्र को ईष्र्या हुई और उसने वृष्टि बंद कर दी, तो राजा ने वायु का रूप लेकर मेघों को वृष्टि से बंद कर दिया। इंद्र ने अग्नि का रूप लेकर यज्ञ, हवन प्रारंभ कर दिए। एक बार भगवान शंकर माता पार्वती के साथ भ्रमण करते हुए अवंतिका नगरी पहुॅचे। राजा रिपंजय ने उनकी आराधना कर उनसे वरदान में राजस्थलेश्वर के रूप में वहीं निवास करने की इच्छा प्रकट की राजा की भक्ति से प्रसन्न होकर शिव ने उसे वरदान दे दिया। तभी से भगवान शंकर राजस्थलेश्वर महादेव के रूप में अवंतिका नगरी में विराजित है। मान्यता है कि जो भी मनुष्य राजस्थलेश्वर महादेव का पूजन करता है उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते है और उसके शत्रु का नाश होता है। उसके वंश में वृद्धि होती है और मनुष्य पृथ्वी पर सभी सुखों का भोग कर अंतकाल में परमगति को प्राप्त करता है।

75/84 बडलेश्वर महादेव

कुबेर के एक मित्र थे, जिनका नाम था मणिभद्रा। उनका एक पुत्र था बडल, जो अत्यंत रूपवान और बलिष्ठ था। एक बार वह कुबेर के बगीचें में नलिनी नामक सुंदरी के पास गया। वहाॅ पहुॅचने पर बडल को वहाॅ की रक्षा करने वाले रक्षकों ने रोका तो बडल ने आपने बल से सभी को मारकर भगा दिया। सभी कुबेर के पास पहुॅचे जहा मणिभद्र भी बैठा था। उन्होंने बडल की पूरी बात बता दी। मणिभद्र ने नलिनी से दुव्र्यवहार करने के कारण बडल को श्राप दिया कि उसका पुत्र नेत्रहीन होकर क्षयरोग से पीडित होगा। श्राप के कारण बडल पृथ्वी पर गिर पडा। इसके पश्चात मणिभद्र बडल के पास आए और उससे कहा कि मेरा श्राप खाली नहीं जाएगा। अब तुम अवंतिका नगरी में स्वर्गद्धारेश्वर के दक्षिण में स्थिति शिवलिंग के दर्शन मात्र से तुम्हारा उद्धार होगा। मणिभद्र पुत्र बडल को लेकर अवंतिका नगरी में आए और यहा बडल ने शिवलिंग के दर्शन किए और उनके स्पर्श करने से उसका क्षय रोग दूर हेा गया और वह पूर्व की तरह रूपवान और नेत्रों वाला हो गया। बडल के यहा दर्शन और पूजन के कारण शिवलिंग बडलेश्वर महादेव के दर्शन और पूजन करता है वह पृथ्वी पर सभी सुखों को भोग कर मोक्ष को प्राप्त करता है।

76/84 अरूणेश्वर महादेव

प्रजापिता ब्रम्हा की दो कन्या थी। एक का नाम था कद्रु और दूसरी विनता। दोनों का विवाह कश्यप मुनि से किया गया। कश्यप मुनि भी दो पत्नी पाकर प्रसन्न थे। एक दिन दोनों ने कश्यप मुनि से वरदान प्राप्त किया। कद्रु ने सौ नाग पुत्रों की माता होने और विनता ने दो पुत्र जो नाग पुत्रों से भी अधिक बलवान हो, ऐसा वर प्राप्त किया। एक समय दोनों कन्याएं गर्भवती हुई। इस बीच कश्यप मुनि वन में तपस्या करेन के लिए चले गए। कदु्र ने 100 नाग पुत्रों को जन्म दिया। दूसरी और विनता को दो अण्डे हुए, जिसे उसने एक पात्र में रख दिया। पाॅच सौ वर्ष बीत जाने के बाद भी विनता को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई तो उसने एक अंडे को फोड दिया देखा कि उसमें एक बालक है जिसका धड और सिर है परंतु पैर नहीं है। क्रोध में आकर बालक अरूण ने अपनी माता को श्राप दिया कि वह लोभवष पूरा निर्मित होने के पूर्व ही आपने मुझे बाहर निकाला है इसलिए मैं श्राप देता हूॅ कि आप दासी होंगी और दूसरा बालक पाॅच सौ वर्ष बाद उसे दासी जीवन से मुक्त कराएगा। श्राप देने के बाद बालक अरूण रूदन सुनकर नारद मुनि वहाॅ पहुंचे और अरूण से कहा कि अरूण जो कुछ हुआ है वह परमात्मा की इच्छा से हुआ है। तुम महाकाल वन में जाओं और वहा उत्तर दिशा में स्थित शिवलिंग के दर्शन और पूजन करो। अरूण महाकाल वन में आया और शिवलिंग का पूजन किया। शिव ने उसकी आराधना से प्रसन्न होकर उसे सूर्य का सारथी बनने का वरदान दिया। कश्यप मुनि के पुत्र अरूण के पूजन करने के कारण शिवलिंग अरूणेश्वर महादेव के नाम से वियात हुआ। मान्यता है कि जो भी मनुष्य अरूणेश्वर के दर्शन करता है उसके पित्रों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

77/84 पुष्पदन्तेश्वर महादेव

काफी समय पहले एक ब्राम्हण था तिमि। उसके कोई पुत्र नहीं था। उसने कई प्रकार से भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की। शिव के प्रसन्न न होने पर उसने और भी अधिक कठोर तप प्रारंभ कर दिया, इस प्रकार बारह वर्ष बीत गए। एक दिन माता पार्वती ने भगवान शंकर को कहा कि यह तिमि नामक ब्राम्हण कई वर्षो से आपकी आराधना कर रहा है। उसके तेज से पर्वत प्रकाशमान है और समुद्र सूख रहा है। आप उसकी कामना की पूर्ति करें। पार्वती की बात मानकर शिव ने अपने गणों को बुलाया और कहा कि तुम में से कोई एक ब्राम्हण के यहा पुत्र रूप में जन्म लो। इस पर शिव के एक गण पुष्पदंत ने कहा कि प्रभु कहा पृथ्वी पर जन्म लेकर दुख भोगेगे हम आपके पास कुशल से है। शिव ने क्रोध में कहा कि तुमने मेरी आज्ञा नहीं मानी अब तुम पृथ्वी पर जाओ। शिव के श्राप के कारण पुष्पदंत पृथ्वी पर गिर पडा। शिव ने दूसरे गण वीरक से कहा वीरक तुम ब्राम्हण के घर जन्म लो, मैं तुम्हारी सभी मनोकामनाए पूर्ण करूंगा। पुत्र पाकर ब्राम्हण प्रसन्न हुआ। दूसरी और पुष्पदंत रूदन करने लगा और कहा कि उसने शिव की आज्ञा नहीं मानी। तब पार्वती ने उससे कहा कि पुष्पदंत तुम महाकाल वन के उत्तर में महादेव है उनका पूजन करों शिव ने भी पुष्पदंत को शिवलिंग की उपासना करने की आज्ञा दी। पुष्पदंत महाकाल वन गया और वहाॅ शिवलिंग के दर्शन कर पूजन किया। उसके पूजन से शिव प्रसन्न हुए और अपनी गोद में बैठाया। उसे उत्तम स्थान दिया। पुष्पदंत के पूजन करने के कारण शिवलिंग पुष्पदंतेश्वर के नाम से वियात हुआ। मान्यता है कि जो भी मनुष्य पुष्पदंतेश्वर के दर्शन करेगा उसके कुल में सात कुलों का उद्धार होगा और अंतकाल शिवलोक को प्राप्त करेगा।

78/84 अभिमुक्तेश्वर महादेव

शाकल नाम के नगर में राजा थे, चित्रसेन। उनकी रानी का नाम था चन्द्रप्रभा। राजा और रानी दोनों रूपवान थे। उनकी एक पुत्री हुई वह भी अत्यंत सुदंर थी, इस कारण राजा ने उसका नाम रखा लावण्यावती। लावण्यावती को पूर्व जन्म की बाते याद थी। लावण्यावती युवा हुई तो राजा ने उसे बुलाया और कहा कि बताओं बेटी में तुम्हारा विवाह किससे करूॅ। राजा की बात सुनकर लावण्यावती कभी रोती तो कभी हंसने लगती। राजा ने उसका कारण पूछा तो उसने कहा कि पूर्व जन्म में वह प्रग्ज्योतिषपुर में हरस्वामी की स्त्री थी। रूपवान होने के बाद भी उसके पति ब्रम्हचर्य का पालन करते थे और उससे क्रोधित रहते थे। एक बार वह अपने पिता के घर गई और उन्हें पूरी बात बताई। उसके पिता ने उसे अभिमंत्रित वस्तुएं और मंत्र दिए, जिससे उसका पति उसके वश में हो गया। पति के साथ सुखी जीवन जीने के बाद उसकी मृत्यु हो गई और वह नरक को प्राप्त हुई। यहा तरह-तरह की यातनाएॅ भोगने के बाद पापों का कुछ नाश करने के लिए वह एक चांडाल के घर उसका जन्म हुआ। यहां सुंदर रूप पाने के बाद उसके शरीर पर फोडे हो गए और जानवर उसे काटने लगे। उनसे बचने के लिए वह भागी और महाकाल वन पहुंच गई। यहा उसने भगवान शिव और पिप्लादेश्वर के दर्शन किए। दर्शन के कारण उसे स्वर्ग की प्राप्ति हुई। स्वर्ग में देवताओं के साथ रहने के कारण उसका आपके यहां जन्म हुआ है। कन्या ने राजा से कहा कि इस जन्म में भी मैं अवंतिका नगरी में शिव के दर्शन करूंगी। राजा अपनी सेना के साथ महाकाल वन आया और कन्या और रानी के साथ शिवजी के दर्शन किए। लावण्यावती ने यहा शिवलिंग के दर्शन और पूजन कर देह त्याग कर शिव में समाहित हो गई। पार्वती जी ने शिवलिंग को अभिमुक्तेश्वर नाम दिया। मान्यता है कि जो भी मनुष्य अभिमुक्तेश्वर महादेव के दर्शन और पूजन करता है उसकी मुक्ति अवश्य होती है। उसे मृत्यु का भय नहीं होता है।

79/84 हनुमंतेश्वर महादेव

भगवान राम ने धरती से रावण और अन्य राक्षसों का वध कर दिया और वे अयोध्या में राज्य करने लगे। तब कुछ ऋषि और मुनि उनके दर्शन के लिए उनके राज्य में उपस्थित हुए। मुनियों ने भगवान राम के सामने प्रस्तुत होकर उनकी आराधना की और उनका गुणगान किया। मुनियों ने कहा कि आपने रावण के कुल का नाश किया, इसमें आपका हनुमान ने सहयोग किया। वानरों ने उस युद्ध को साक्षात देखा। तब भगवान राम ने कहा कि मुनियों आपने हनुमान के पराक्रम का वर्णन किया परंतु लमण ने भी युद्ध किया और मेघनाथ का वध किया। इस पर मुनियों ने कहा कि हनुमान का पराक्रम सभी के पराक्रम से विशाल है। राम ने कारण पूछा तो मुनियों ने कहा कि हनुमान जब बाल रूप में थे तब एक बार में सूर्य को फल समझकर खाने के लिए निकल गए थे। इंद्र ने अपने वज्र से उन पर प्रहार किया, जिससे उनके होंठ पर चोट आई और वे एक पर्वत पर गिर पडे। वायु देव उन्हें लेकर महाकाल वन आए और यहा शिवलिंग के सामने भगवान शंकर की अराधना करने लगे। शिवलिंग के स्पर्श करने से हनुमान जीवित हो उठे। इस दौरान यहा सभी देवता आए और हनुमान को वरदान दिया। ऋषियों के श्राप के कारण हनुमान अपना बल भूल गए थे और समुद्र लांघने के समय जामवंत ने हनुमान को उनका बल याद दिलाया था। हनुमान के शिवलिंग के स्पर्श और रावण के वध के बाद पूजन के करण शिवलिंग हनुमत्केश्वर महादेव के नाम से वियात हुए। मान्यता है कि जो भी मनुष्य शिवलिंग का पूजन करता है उसकी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।

80/84 स्वप्नेश्वर महादेव

काफी समय पहले कल्माषपाद नाम के एक राजा हुआ करते थे। एक बार उन्हांेने वन में वशिष्ट मुनि के पुत्र और बहु को देखा। उस समय उनका पुत्र ध्यान में बैठा हुआ था। राजा ने मुनि से कहा कि रास्ते से हट जाओं, परंतु मुनि ने नहीं सुना, तो राजा ने क्रोध में आकर मुनि पर चाबुक से प्रहार करना शुरू कर दिया। यह देख वशिष्ट मुनि के दूसरे पुत्र ने राजा को श्राप दिया कि राजा तू राक्षस होगा और पुरूषों का भक्षण करेगा। राजा ने अपनी गलती की क्षमा माॅगी परंतु उसे माफी नहीं मिली। राजा ने वशिष्ट मुनि के पुत्रों ओर बहू को खा लिया। रात को राजा को कई बुरे स्वप्न आए। उसने सुबह मंत्री को बताया। मंुत्री राजा को लेकर वशिष्ट मुनि के पास आया। वशिष्ट मुनि ने राजा से कहा कि राजन आप अवंतिका नगरी में महाकालेश्वर के पास स्थित शिवलिंग के दर्शन करें, इससे आप के सभी दुःस्वप्न का नाश होगा। राजा वशिष्ट मुनि के कहे अनुसार अवंतिका नगरी में आया और यहा शिवलिंग का दर्शन और पूजन किया। राजा के बुरे सपनों का नाश होने के कारण शिवलिंग स्वप्नेश्वर महादेव के नाम से वियात हुआ। मान्यता है स्वप्नेश्वर महादेव के दर्शन से बुरे सपनों का नाश होता है।

81/84 पिंगलेश्वर महादेव

एक बार माॅ पार्वती ने शिवजी से पृथ्वी पर उत्तम स्थान को देखने की बात कहीं। शिवजी उन्हें महाकाल वन लाए और बताया कि यह स्थान तीनों लोकों में सर्वोम है। पार्वती के कहने पर भगवान शंकर ने चार दिशाओं में चार द्वार बनाये और द्वारपालों की स्थापना की शिवजी ने पूर्व दिशा में पिंगलेश्वर दक्षिण में कायवरोहणेश्वर उत्तर में विश्वेश्वर और पश्चिम में दुर्दश्वर की स्थापना की शिव ने गणों को आज्ञा दी कि जो भी मनुष्य इस क्षेत्र में मृत्यु को प्राप्त हो वे उसकी रक्षा करें। इसके बाद भगवान शिव ने पार्वती को पिंगलेश्वर की कथा बताई। कान्यकुज नगर में एक कन्या थी जिसका नाम था पिंगला वह अत्यंत सुंदर थी पिता विपेन्द्र पिंगल धर्म और वेद के ज्ञाता थे। एक बार उनकी पत्नी मृत्यु को प्राप्त हुई विपेन्द्र घर छोडकर बेटी का भी रक्षण करने लगा एक दिन उसकी भी मृत्यु हो गई पिता की मृत्यु से पिंगला दुखी हो गई और रूदन करने लगी धर्मराज ब्राम्हण का रूप लेकर आये और उसे बताया कि यह दुख तुम्हे पिछले जन्म के कर्मो के कारण हो रहा है। पिछले जन्म में भी तुम अत्यंत सुंदर थी और वैश्यावर्ती करती थी। एक ब्राम्हण तुम्हारे रूप के वशीभूत होकर साथ रहता था। तुम्हारे साथ रहने के लिए अपनी पत्नी का त्याग कर दिया था। एक दिन एक शूद्र ने घर में उस ब्राम्हण की हत्या कर दी, उस ब्राम्हण के माता पिता ने तुम्हे राप दिया कि तुम पिता वियोग सहोगी और पति को प्राप्त नहीं करोगी। पिंगला ने उनसे पूदा कि वह ब्राम्हण जन्म में कैसे हुई धर्मराज ने बताया कि एक बार वासना से पीउित एक ब्राम्हण को राजा ने बंधक बना लिया उस ब्राम्हण को तुमने बंधन से छुडाया और घर ले आई उस ब्राम्हण के साथ रहने के कारण तुम्हें इस जन्म में ब्राम्हण का जन्म मिला पिंगला ने पूछा अब उसे मुक्ति कैसे प्राप्त होगी। धर्मराज ने बताया कि अवंतिका में महाकाल वन में पूर्व दिशा में शिवलिंग का दर्शन करों उससे तुम्हारी मनोकामनाएॅ पूर्ण होगी पिंगला महाकाल वन आई और यहां शिवलिंग के दर्शन कर देह को त्यागा और शिवलिंग में लीन हो गई। पिंगला के मुक्ति से शिवलिंग का नाम पिंगलेश्वर हुआ। मान्यता है कि जो भी मनुष्य पिंगलेश्वर महादेव के दर्शन करेगा उसके घर में सदा धर्म और धन निवास करेंगे और अंतकाल में स्वर्ग को प्राप्त करेगा।

82/84 कयवारोहणेश्वर महादेव

प्रजापति दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव को आमंत्रित न करने पर उमा क्रोधित हो गई और उन्होंने शक्ति से भद्रकाली माया को उत्पन्न किया। दूसरी ओर उमा के यज्ञ में भस्म हो जाने से क्रोधित होकर वीरभद्र को यज्ञ का नाश करने के लिए भेज दिया। भद्रकाली और वीरभद्र ने मिलकर यज्ञ स्थल पर हाहाकार मचा दिया। उन्होंने देवताओं को प्रताडित किया कई देवता प्रकोप से कार्यविहित हो गये। कुछ देवता भय के कारण ब्रम्हा की शरण में गए ब्रम्हा कैलाश पर आये और शिव की स्तुति कर देवताओं को पुनः काया कैसे प्राप्त होगी उसका उपाय पूछा तब भगवान शंकर ने कहा कि महाकाल वन के दक्षिण द्वार पर स्थित कायावरोहणेश्वर शिवलिंग के दर्शन करे। यह बात सुनकर सभी देवता महाकाल वन में आए और शिवलिंग के दर्शन कर आराधना की और काया को प्राप्त किया देवताओं की काया प्राप्त करने के कारण शिवलिंग कायावरोहणेश्वर के नाम से वियात हुआ। मान्यता है कि जो भी मनुष्य शिवलिंग के दर्शन कर आराधना करता है वह पृथ्वी पर उत्तम राज सुख भोग कर अंतकाल में स्वर्ग में गमन करता है।

83/84 विल्वेश्वर महादेव

एक बार ब्रम्हा ने लोगों पर दया करने के लिए भगवान का ध्यान किया, उससे कल्पवृक्ष उत्पन्न हुआ वृक्ष में बिल्व का पेड भी था उसके एक पो के नीचे एक पुरूष आरा कर रहा था। ब्राम्हण आए और उसे बिल्व दिया ब्राम्हण के जाने के बाद इंद्र वहाॅ आए और उसे पृथ्वी पर राज करने के लिए कहा बिल्व ने कहा कि इंद्र का वज्र मिले तो वह पृथ्वी पर राज करेगा। इंद्र ने उससे कहा कि जब भी तुम वज्र का स्मरण करोगे वज्र तुम्हारे पास आ जायेगा। इसके बाद बिल्व पृथ्वी पर राज करने लगा। कपिल मुनि और विलव में मित्रता हो गई एक बार धर्मवार्ता के दोरान दोनों झगडने लगे और विल्व ने वज्र से कपिल मुनि के सिर पर प्रहार कर दिया। कपिल मुनि ब्रम्हा विद्या से स्वयं को ठीक कर ब्रम्हा के पास गये और वरदान मांगा की उन पर वज्र का प्रहार नहीं होगा और इसके पश्चात एक बार फिर बिल्व और कपिल मुनि में विवाद हुआ, परंतु इस बार ब्रम्हा के वरदान के कारण उन पर वज्र का प्रहार नहीं हुआ बिल्व ने भगवान विष्णु की उपासना कर वरदान मांगा की कपिल उससे डरे। वरदान देेकर विष्णु कपिल मुनि के पास गये और उनसे कहा कि वह बिल्व से कहे वह उससे डरते है कपिल मुनि ने मना किया तो विष्णु उनसे युद्ध करने लगे। इस बीच ब्रम्हा ने आकर युद्ध शांत कराया दूसरी और बिल्व रूदन करने लगा कि कपिल उससे डरते नहीं है। यह देख इंद्र ने कहा कि बिल्व तुम महाकाल वन में पश्चिम दिशा में स्थित शिवलिंग के दर्शन करो। इससे तुम्हे विजय प्राप्त होगी। बिल्व महाकाल वन में आया और यहा आकर उसने शिव के दर्शन कर पूजन किया। इस बीच कपिल मुनि वहाॅ पहुॅचे उन्होंने देखा कि बिल्व के शरीर में शिव है तो उन्होंने बिल्व से कहा कि तुमने मुझे जीत लिया रजाा बिल्व के दर्शन और पूजन के कारण शिवलिंग बिल्वकेश्वर महादेव के नाम से वियात हुआ। मान्यता है कि जो मनुष्य शिवलिंग के दर्शन करेगा। वह सभी पापों से मुक्त होगा। और अंतकाल में शिवलोक को प्राप्त करेगा।

84/84 दद्धेश्वर महादेव

अयोध्या के राजा को वन में एक कन्या मिली। वे उससे विवाह कर उसे राज्य में ले आए। उसके मोह में राजा का ध्यान राजकाज से हट गया। राजा के मंत्री ने सुंदर वाटिका निर्माण कराकर राजा को वहाॅ उसे रानी के साथ छोड दिया। एक बार रानी वहां बने एक तालाब में स्नान करने गई और फिर वापस नहीं आई। उस तालाब में दुर्दुर (मेंढ़क) अधिक थे। राजा ने सभी मेढ़कों को नष्ट करने का आदेश दे दिया। इस बीच मेंढ़को का राजा निकलकर आया और कहा मेरा नाम आयु है और जो कन्या है वह उसकी पुत्री है। उसकी कन्या को नाग लोग का राजा नागचूड ले गया है। आप उसे याद किया और उससे रानी को मांगा। नागचूड ने राजा को उसकी रानी सौप दी। नागचूड ने कहा कि उसने गालव ऋषि का उपहास उडाया था। इस कारण उसे दुर्दुर होने का श्राप दिया। उन्होंने कहा जब तुम अपनी कन्या झक्ष्वाकु कुल के राजा को दान करोगे और महाकाल वन के उत्तर में स्थित शिवलिंग के दर्शन करोगे तो तुम्हें मुक्ति मिलेगी। ऐसा करने के बाद वे स्वर्ग को प्राप्त हुए। दुर्दुर से मुक्ति के कारण शिवलिंग दुर्दुरेश्वर महादेव के नाम से वियात हुए। मान्यता है कि जो भी दुर्दुरेश्वर महादेव के दर्शन करेगा उसके पाप नष्ट होंगे।